
**होता जो शोहरत में ही नशा,
तो मयखाने में टूटे दिल न होते।
मिलता जो सुकून बाहों में,
तो सुकून के लिए ये तलाक न होते।
होता जो वफ़ा में कोई असर,
तो रिश्तों में ये फासले न होते।
जो मिलती मोहब्बत बेखौफ़ होकर,
तो दिल यूँ दर-ब-दर न होते।
जो समझ लेते लोग इश्क़ की जुबां,
तो खामोश ये सिसकते लफ्ज़ न होते।
अगर सच्चा होता हर एक सफर,
तो मोड़ पे यूँ बिछड़ते हम न होते।
जो मिलती हर चाहत पूरी तरह,
तो अधूरी ये दास्तां न होते।
अगर दिलों में बस इज़्ज़त होती,
तो ये टूटे हुए आशियां न होते।
अगर वक्त ही वफ़ा निभा जाता,
तो यादों में यूँ जख्म न होते।
जो मिल जाती हर दुआ मुकम्मल,
तो आँखें ये नम न होते।**