मोहब्बत:सौ जिस्म को पाने की एक होड़ है


मोहब्बत अब वो महब्बत नहीं,
बस शिकवा-शिकायत है.
सौ जिस्म को पाने की,
बस एक होड़ है.
नारी सौ दहलीज को लांघ कर भी,
जहाँ शर्म से अब भी बंधी है,
ऐसे असंख्य झूठे कहानियों की,
एक किताब है.
झूठे आंसू, झूठे वादे,
झूठे अदाओं से भरपूर,
बेवफाओं की एक दास्ताँ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

छोट पड़ल खटिया


हमरा से कहअ सैयां, जियरा के बतिया,
केने – केने धोती खुलल, आ केने कटल रतिया।
मत पूछह रानी, लिखल रहल यह देहिया के दुर्गतिया,
अंग – अंग टूटे लागल, जब छोट पड़ल खटिया।
भुइंया काहें ना पसर गइल अ, मीठ मिलित निंदिया,
अइसन का रहल की ना छुटल तहरा से खटिया।
मत पूछ ह रानी, कइसन निक रहल खटिया,
देहिया के गिरते ही धड़ लेहलख निंदिया।

परमीत सिंह धुरंधर

उलझते – उलझते


यूँ ही उलझनों में,
उलझते – उलझते,
सुलझाई है मैंने जिंदगी।
उनको नाज है की वो,
महफ़िलों की चाँद हैं.
मगर मैंने आज भी अंधेरों में,
जलाये राखी है ये रौशनी।

परमीत सिंह धुरंधर

आज की नारी / चरित्र का दोहरापन


वक्षों से ढलकता है,
आँचल,
हर एक पल में.
बिना हवाओं के.
और वो शिकायत करती हैं,
मुझसे की,
मेरी नजरें वहीँ हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न और कुत्ता


पालतू कुत्तों की एक भीड़ खड़ी है,
फिर भी हुस्न वाले कहते है,
पुरुष अहंकारी बहुत है.
जाने कैसे लिखते है वो दोहे,
मेरी कलम ने,
तो बस एक सच्चाई लिखी है.

परमीत सिंह धुरंधर

दिवाली और दाल


कलेजा चीर देहलू तू ऐसे मुस्का के,
अब धोती मत फाड़ दअ, देह – से देह लगाके।
सारा थाती चल गइल,
ई दाल 250 रुपया किलो खरीदे में,
अब साड़ी मत मांगे लगियह,
करवा – चौथ आ दिवाली तू बता के.

परमीत सिंह धुरंधर