नागिन का ताप ना मिटा


सदियाँ गुजर गयीं,
वो दर्द ना मिटा।
ओठों का तेरे अब तक,
वो रंग ना मिटा।
मेरे खवाबों में आते हैं,
अब भी वो तारें।
जिनके चाँद का,
वो दाग ना मिटा।
कैसे संभाले कोई जीवन को?
नागिन का विष उतर भी जाए तो.
हाय, तन से अभी तक,
उस दंश का ताप ना मिटा,
रे ताप ना मिटा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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