दरख्तों में सुराख कर गए हो


दिल-शहर में, हमसे पूछो तुम,
कितनों के मकानों में, तुम बस गए हो.
झुकी – झुकी निगाहों से अपने,
पुराने -नए, सब दरख्तों में सुराख कर गए हो.
परिंदे जिन्हें पसंद हैं, आसमा की उड़ान,
उन्हें भी जमीन पे चमन दिखा गए हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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