वफाओं पे रोती हैं


हमसे क्या पूछते हो?
किनारों पे घर कैसे बनायें?
कई शहर डूबे हैं,
इन किनारों पे बसकर।
शौक किसे नहीं,
की सागर की लहरों पे खेले।
मगर कस्तियाँ नहीं उतारते इनमे,
दिल में जुल्फों का ख्वाब रखकर।
खुदा भी उसका नहीं,
जो इश्क़ में, हुस्न पे, आँख मूंद ले.
वफाओं पे रोती हैं ये, बेवफाओं के आँगन में,
अपने वफादारों को मिटा कर.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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