मेरे वक्ष ही हुए मेरे सौतन


जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
मेघ बरसे, माटी भींगें, सोंधी रे महक,
बिन तेरे बालम जी, अंग -अंग भारी और प्रबल।
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
चुहानी बैठूं, जांत चलाउन, मुसल चलाउन,
कहाँ मिटती हैं फिर भी तन – मन की थकन.
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।
कलियाँ खिलीं, भ्रमर गूंजे, आयी रे सावन,
बिन तेरे बालम जी, मेरे वक्ष ही हुए मेरे सौतन।
जब से भए तुम बालम जी परदेसिया,
प्यासी – प्यासी मैं, प्यासी रे अचरिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

2 thoughts on “मेरे वक्ष ही हुए मेरे सौतन

Leave a reply to prashant singh Cancel reply