तन्हाई में कट रहीं हैं ये चांदनी राते


कोई मिलता ही नहीं, जिसे अपना कह सके,
तन्हाई में कट रहीं हैं ये चांदनी राते।
किसको नहीं है शौक ओठों के जाम का,
बेबसी बन गयीं हैं ये जवानी की साँसे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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