मेरे पोसे चार कबूतर,
रोज उड़ जाते हैं.
दूर- दूर जाते हैं,
आसमाँ में और नए – नए,
मादाओं के संग दाना चुगते हैं.
मगर शाम को मेरे छत पे,
चले आते हैं.
इनके नयी पीढ़ी तो,
बिना सिखाये ही हमारे बन गए हैं.
मेरे पाले चार कुत्ते,
दिन भर मेरे संग घूमते हैं.
किसपे भौकना है,
और किसको काटना है,
ये मेरे आँखों के इशारों से पढ़ लेते हैं.
मैं चाहे दो रोटी दूँ,
या इन्हे भूखा रख दूँ,
ये कभी मेरे द्वार और मुझे नहीं छोड़ते हैं.
मेरे रटाये चार तोते,
दिन – रात मेरे सिखाये शब्द ही नहीं,
नए शब्द भी बोलते हैं.
कभी – कभी तो अपशब्द भी बोलते हैं.
आँगन में छोड़ने पे भी,
अपने पिंजरे में चले जाते हैं.
मेरे पाले – पोसे, खिलाये -पिलाये,
चार मैना, आज महीनो बाद,
पिंजरे से निकालने पे,
ऐसे उड़े की फिर लौटे नहीं, उड़ कर।
मैं परेशान, उदास,
समझने में नाकाम रहा, ये अंतर।
मैं दौड़ कर, भाग कर,
विनोद दुआ – रविश कुमार के पास गया.
उन्होंने कहा की मैना को आज़ादी पसंद है.
जबकि तोता, कुत्ता और कबूतर,
के मन -मस्तिक गुलामी की जंजीरों में,
बंधी हैं.
और उन्हें आज़ादी का आभास नहीं है.
फिर मैंने कहा, “तो आप लोगो की नजर में नितीश कुमार अपराधी कैसे हैं”.
चेहरे का रंग बदल, आँखों में गुस्सा ला कर,
दोनों ने कहा की नितीश कोई मैना हैं क्या?
मानव के लिए, आज़ादी से ज्यादा धर्मनिरपेक्षता जरुरी है.
वो बोलें, “तुम सा मोदी भक्त ये नहीं समझ सकता।”
मैं आज भी भटक रहा हूँ,
की कोई मुझे ये समझा दे.
क्यों मैना को आज़ादी पसंद है?
और क्यों नितीश कुमार को आज़ादी नहीं,
धर्मनिरपेक्षता चुनना चाहिए?
आप अगर जानते हैं, या किसी को जानते हैं,
जो मुझे इसका भेद समझा दे.
तो मुझे जरूर बताये।
परमीत सिंह धुरंधर