फिर क्यों रखती हो दुप्पट्टा?


बड़ी बेचैन करती हो,
मेरे इरादे पूछकर।
फिर क्यों रखती हो दुप्पट्टा?
सीने से बांधकर।

चाहत तुमको भी तो है,
कोई जवाँ – दिल मिले।
फिर क्यों दुरी रखती हो,
हाय नजरों को लड़ाकर।

हर बात में तुम्हारा,
यूँ मासूम बन जाना।
फिर क्यों घड़ी – घड़ी मुस्काती हो?
यूँ आइना देख कर.

यूँ तिरछी नजर से, मुड़कर पीछे,
किसका है इन्तिज़ार तुम्हे।
फिर क्यों आने पे मेरे?
चल देती हो यूं मुख मोड़कर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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