मेरे कदम चलना नहीं चाहते,
और पेट भोजन का मोह त्यागना नहीं चाहता।
नयन चाहते हैं उसके यौवन पे ही,
सदा – सर्वदा टीके रहें।
कैसे पुरुषार्थ करे मानव?
जब जिस्म उसके आगोस की,
गुलामी, आँखों की मक्कारी,
को तोड़ना नहीं चाहता।
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे कदम चलना नहीं चाहते,
और पेट भोजन का मोह त्यागना नहीं चाहता।
नयन चाहते हैं उसके यौवन पे ही,
सदा – सर्वदा टीके रहें।
कैसे पुरुषार्थ करे मानव?
जब जिस्म उसके आगोस की,
गुलामी, आँखों की मक्कारी,
को तोड़ना नहीं चाहता।
परमीत सिंह धुरंधर