खा जातें हैं धोखा हर बार.


हमें शौक है ए समंदर तेरे किनारों का
मगर रखते हैं अब भी हौसला
तेरी लहरों को बाँध के रखने का.

हम खा जातें हैं धोखा, ये सही है
प्रेम में बंध कर हर बार.
मगर कोई नहीं है ऐसा जो रखता हो
ताकत मेरे संसार को डुबोने का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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