दसरथ-पुत्र हूँ मैं


ए समंदर मेरे, मेरा शौक रख
माना की अकेला हूँ अभी
पर फिर भी तू मेरा खौफ रख.

तेरे तट पे अभी भिक्षुक हूँ मैं
पर दसरथ-पुत्र हूँ मैं
उसका तो तू मान रख.

गुजरा है मेरा भी कारवां
जय – जयकारों के उद्घोष से.
अगर तू अनजान है तो
बेसक यूँ ही मौन रख.

मगर मेरी तीरों को अब भी
आशीष प्राप्त है महादेव का.
अतः निष्कंटक छोड़ दे मेरी राहें
अन्यथा रघुवंश से युद्ध का गर्व प्राप्त कर.

परमीत सिंह धुरंधर

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