छपरा के धुरंधर


ऐसी चढ़ी जवानी सखी,
की हाहाकार मचा दूंगी।
पतली कमर के लचक पे अपनी
सखी, चीत्कार मचा दूंगी।
तरस रहे हैं,
आरा – बलिया के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर
संग खाट बिछा लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

आह उठने लगी है
मेरी गदराई जवानी पे.
खेत और खलिहान सब सखी,
अपनी चोली से सुलगा दूंगी।
तरप रहे हैं,
गोरखपुर – धनबाद के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर से
चोली सिला लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।

परमीत सिंह धुरंधर

तीन – तलाक पढ़ गयी


दुनिया छोटी पर गयी अब तो
मेरी प्यास इतनी बढ़ गयी
अरे जब से तुझपे नजर मेरी पड़ गयी.

सब इतने दीवाने हैं महफ़िल में तेरे रूप पे
कितनो की बीबी उनको
तीन – तलाक पढ़ गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

फिर कैसे ना Crassa मात खाए?


हुश्न है एक, हजारों अदाएं
फिर कैसे ना Crassa मात खाए?

कभी वक्षों पे जुल्फें,
कभी नितम्बों पे नागिन लहराए।
फिर कैसे ना Crassa मात खाए?

कभी नैनों से मदिरा छलके
कभी मृग सी मन बहकाए।
फिर कैसे ना Crassa मात खाए.

परमीत सिंह धुरंधर

हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?


तीक्ष्ण नैनों के बाण चलाकर
मृग-लोचन से मदिरा छलकाकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

नितम्बों पे वेणी लहराकर
वक्षों पे लटों को बिखराकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

शर्म-हया-लज्जा में अटखेली घोलकर
नवयौवन के रस में मादक पलकों के पट खोलकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

जोबन के दंश को सहकर
सुडोल अंगों को आँचल में सहेजकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

ह्रदय में मिलान की तस्वीर सजोंकर
विरह में प्रिय के जलकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”

मेरे ह्रदय की गति को बढ़ाकर
वो तरुणी अपनी संचित मुस्कान बिखेरकर
बोली, “हे पथिक, किस पथ के गामी हो?”

परमीत सिंह धुरंधर


मदिरालय की अप्सराओं में


पनघट पे जो प्रेम मिला, वो कहाँ है इन मयखानों में?
सारा मेरा सागर सोंख गयी वो रात की पायजेबों में.

वो घूँघट से झाँकती, मुस्काती आँचल के ओट से
वो लचक कमर की अब कहाँ इन मदिरालय की अप्सराओं में.

परमीत सिंह धुरंधर