फासला – 2


तुम्हे चाहत है जिस समंदर की
उसका किनारा कहीं पराया ना लगे.

हम तो जी लेंगें यूँ ही तड़प -तड़प के
गुलाबों की सेज कहीं तुझे रुलाया ना करे.

परमीत सिंह धुरंधर

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