सिंह


जब सिंह करता है गर्जना,
तो जग करता है भर्त्स्ना,
तो क्या सिंह अपनी चाल बदल ले?
तो क्या सिंह अपना राज छोड़ दे?
सिंह को जरुरत नहीं, सियारों के संख्या की,
सिंह को चाहत नहीं, कुत्तों के भीड़ की,
अकेला है सिंह वन में,
तो क्या लड़ना छोड़ दे?
बूढ़ा है सिंह तन से,
तो क्या भिड़ना छोड़ दे ?
सिंह की हुंकार वही,
ललकार वही,
एक दिन होगी सिंह की,
जयजयकार यहीं,
एक दिन होगा सिंह का,
साम्राज्य यहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

सिलवट – लोढ़ा


तू गावं की छोरी, मैं शहर का छोरा,
आज खेले हम सिलवट – लोढ़ा।
तू डाल दे हल्दी, मैं मार दूँ हथोड़ा,
रंग खिलेगा तब चोखा – चोखा।
खेत हैं तेरे सारे धान वाले,
उसमे उपजा रहा है गेहूं, बाप तेरा,
अकल है जिसमे बस थोड़ा – थोड़ा।
नयन तेरे हैं सागर से,
मैं भीं उसमे एक पल बिता लूँ.
समझा दे अपने घरवालों को,
ना छेड़ें इसको,
वरना नासूर बन जाएगा ये फोड़ा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ के हाथों में दौलत बहुत है


जी रहा हूँ इस शहर में बस तेरा जिस्म देख के,
जिसपे रेशम का दुप्पटा फिसलता बहुत है.
लूटा दी अपनी सारी खुशियाँ,
परदेस में जिस दौलत को कमाने में.
उसे कमाने के बाद हम ये समझे,
की माँ के हाथों में दौलत बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेबसी


हम लूटा दे अपनी जिंदगी जिन आँखों पे.
उन आँखों को शहर की रौशनी भायी है.
हम बुझाएं भी तो ये चिराग कैसे,
इसी की रोसनी में वो नजर आई हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रातों में यहाँ कंगन खनकते बहुत हैं


हुस्न सजता बहुत है, रंग और पोशाकों में,
पर उसके दामन में वेवफाई के दाग बहुत है.
वो कहते हैं बार – बार चिल्ल्ला कर,
राम – गौतम बुध की गलतियां।
मैं जब कहता हूँ आम्रपाली – मेनका,
तो वो बैठते, चुप बहुत हैं.
सिर्फ तबाही नहीं होती गोली और बारूदों से,
मोहब्बत में मिटे बेटे पे चित्कारती यहाँ माँ बहुत हैं.
कोई आँखों में काजल लगा के ये न कहे की शर्म है,
रातों में यहाँ, आज भी कंगन खनकते बहुत हैं.
बहुत देखा है मैंने हुस्न वालो का चरित्र,
यहाँ खूबसूरत चेहरों के पीछे छल बहुत हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चोली तहार अब दू गो हाथ मांग अ ता


धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
ऐसे मत बाँध अ अंचरा के कमर से,
ढोरी पे तहार कौआ दावँ मार अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
भीगल तहार चोली में बाढ़ आइल बा,
छोटी सी पोखरा में ज्वार आइल बा.
ऐसे मत खोंस अ साया ऊपर करके,
कछुआ भी देख अ आँख मार अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
मत जलाव अ अपना जवानी के तू,
ऐसे दिन-रात एक प्राण के खातिर।
कभी सुस्ता भी ल बथानी में हमारा,
की खटिया हमार अब दू गो देह मांग अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
लचकत तहार कमरिया पगडण्डी में,
अरे मुखिया के घर तक भूचाल मार अ ता.
कब तक रख बू बाँध – बाँध के,
की चोली तहार अब दू गो हाथ मांग अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.
आव अ बैठ अ पास तनी,
तहार रूप अब हमार साथ मांग अ ता.
रखें तहारा के आपन बनाके,
तहार अंग – अंग अब हल्दी के रंग मांग अ ता.
धोबन तहार जोबन उछाल मार अ ता,
दरिया के पानी में ताप मार अ ता.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो आज भी देखती हैं


वो आज भी देखती हैं,
मुझे आँखों से,
एक टकटकी लगा के.
घर है, दौलत है,
बच्चे हैं,
फिर भी जाने क्या,
रख्खा है मुझसे,
एक आस लगा के.
वो आज भी देखती हैं,
मुझे आँखों से,
एक टकटकी लगा के.
जवानी है, खूबसूरती है,
शोहरत है,
फिर भी जाने क्या,
रख्खा है खामोस निगाहों में,
मुझसे उम्मीद लगा के.
वो आज भी देखती हैं,
मुझे आँखों से,
एक टकटकी लगा के.
पति है, पैसा है,
पुरस्कार है,
फिर भी जाने क्या,
मुझसे चाहती हैं,
मेरा सब कुछ मिटा के.
वो आज भी देखती हैं,
मुझे आँखों से,
एक टकटकी लगा के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न और कुत्ता


एक भीड़ सी लगी है कुत्तों की,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष में अहंकार बहुत है.
सब – कुछ रख दिया है उनकी चरणों में,
लात खा कर भी वही पड़े हैं,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष में अहंकार बहुत है.
सबसे बड़ी अहिषुण्ता, दोगलापन है ये,
नारी ही उजाड़ रही है घर नारी का,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष को जिस्म की भूख बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ का इरादा है


माँ का इरादा है,
की मुझको सवारें।
माँ का इरादा है,
की मुझको खिलाये।
माँ की आँखों की,
बस ज्योति मैं ही हूँ.
माँ ने अपनी आँखों का टीका,
बस मुझको ही लगाया है.
फिर कैसे तेरे योवन पे,
अपनी माँ को भुला दूँ.
माँ ने,
मेरे लिए चुल्ल्हा जलाया है,
माँ ने मेरे लिए,
रात के तीन बजे पुआ पकाया है.
अपनी हाथों को जलाकर,
मुस्कराकर, माँ ने मुझे,
भर पेट खिलाया है।
फिर कैसे तेरे अंगों पे,
माँ के छाले भुला दूँ.
ए हुस्न,
मेरी हसरत नहीं,
तुझको पाने की.
वो नासमझ थे,
जिन्होंने तेरी मोहब्बत में,
आसूं  बहाएं।
मैं उन सितारों में नहीं,
जो अंधेरों में छोड़कर माँ को,
बस तेरा आँचल सजाए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

Java


ए Java तेरी चाहत में हमने,
रातों की नींदे उड़ा दी.
मेरे महबूब ने थामा किसी और को,
हमने आँखे Terminal में गड़ा दी.
Compiler इतने Error दे रहा है,
दिल की बेचैनी बढ़ती जा रही.
ए Java तेरी चाहत में हमने,
खाना – पीना सब छोड़ दिया है,
मेरे महबूब ने तोडा है दिल मेरा,
अब तू तो वफ़ा दिखा दे.

 

परमीत सिंह धुरंधर