मैं मलखान बन गया


की तू जब से हुई जवान,
मैं मलखान बन गया.
ज्यों -ज्यों ढलका आँचल,
मैं मस्तान बन गया.
चोली – चुनर, सब एक – एक,
करके बिछड़ने लगे.
बदलते आँखों के तेरे रंग पे,
मैं सुलतान बन गया.
काली राते भी चमक उठीं,
अंगों के तेरे चमक पे.
सीने से तेरे लग के,
मैं आज धनवान बन गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


भगवान गणेश जी, भगवान श्री कृष्णा जी और भगवान हनुमान जी, सभी महान बने क्यों की उनका बचपन बस माँ और उनके हाथों से बने खाने को खाने में गुजरा। माँ के हाथ और उसके हाथ से बने खाने की महिमा इसी से समझी जा सकती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

की जब तक हैं गुरु गोबिंद सिंह जी


भारत को जीत कर भी,
तुम कभी जीत नहीं पाओगे।
हम राजपूतों – जाट -मराठों को,
तुम कभी बाँध नहीं पाओगे।
तुम चाहे तोप बरसा लो,
या हमपे हाथी दौड़ा लो.
रणभूमि में तुम हमें,
कभी पछाड़ नहीं पाओगे।
तानसेन के छंदों पे,
जितना भी वीर बनले अकबर।
राणा की बरछी का,
सामना नहीं कर पाओगे।
सुन लो ए मुगलों,
चाहे भाइयों को भाई से लड़ा लो.
मगर कभी अकबर को ना,
रणभूमि में उतार पाओगे।
हम हारकर भी, झुक जाए,
मिट जाए, अगर किसी दिन.
पर सिक्खों की बस्ती में,
तुम लोहा ना उठा पाओगे।
की जब तक हैं गुरु गोबिंद सिंह जी,
ए मुगलों,
तुम कभी भारत न जीत पाओगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत:सौ जिस्म को पाने की एक होड़ है


मोहब्बत अब वो महब्बत नहीं,
बस शिकवा-शिकायत है.
सौ जिस्म को पाने की,
बस एक होड़ है.
नारी सौ दहलीज को लांघ कर भी,
जहाँ शर्म से अब भी बंधी है,
ऐसे असंख्य झूठे कहानियों की,
एक किताब है.
झूठे आंसू, झूठे वादे,
झूठे अदाओं से भरपूर,
बेवफाओं की एक दास्ताँ है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

Your kisses are marijuana


Your kisses are marijuana,
For me,
How can I stop to inhale?
Every wave inside me,
Wants your arms around me.
For such small thing,
How can I forget to dream?
Your eyes are moon in my sky,
I cannot walk alone,
In the dark night,
How can I leave you?

Parmit Kumar Singh

छोट पड़ल खटिया


हमरा से कहअ सैयां, जियरा के बतिया,
केने – केने धोती खुलल, आ केने कटल रतिया।
मत पूछह रानी, लिखल रहल यह देहिया के दुर्गतिया,
अंग – अंग टूटे लागल, जब छोट पड़ल खटिया।
भुइंया काहें ना पसर गइल अ, मीठ मिलित निंदिया,
अइसन का रहल की ना छुटल तहरा से खटिया।
मत पूछ ह रानी, कइसन निक रहल खटिया,
देहिया के गिरते ही धड़ लेहलख निंदिया।

परमीत सिंह धुरंधर

उलझते – उलझते


यूँ ही उलझनों में,
उलझते – उलझते,
सुलझाई है मैंने जिंदगी।
उनको नाज है की वो,
महफ़िलों की चाँद हैं.
मगर मैंने आज भी अंधेरों में,
जलाये राखी है ये रौशनी।

परमीत सिंह धुरंधर

आज की नारी / चरित्र का दोहरापन


वक्षों से ढलकता है,
आँचल,
हर एक पल में.
बिना हवाओं के.
और वो शिकायत करती हैं,
मुझसे की,
मेरी नजरें वहीँ हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न और कुत्ता


पालतू कुत्तों की एक भीड़ खड़ी है,
फिर भी हुस्न वाले कहते है,
पुरुष अहंकारी बहुत है.
जाने कैसे लिखते है वो दोहे,
मेरी कलम ने,
तो बस एक सच्चाई लिखी है.

परमीत सिंह धुरंधर

दिवाली और दाल


कलेजा चीर देहलू तू ऐसे मुस्का के,
अब धोती मत फाड़ दअ, देह – से देह लगाके।
सारा थाती चल गइल,
ई दाल 250 रुपया किलो खरीदे में,
अब साड़ी मत मांगे लगियह,
करवा – चौथ आ दिवाली तू बता के.

परमीत सिंह धुरंधर