कृष्ण – अर्जुन


असमंजस में अर्जुन,
की तीर किसपे चलाये?
रणभूमि में कहीं पितामह,
कहीं भ्राता नजर आएं.
दुविधा देख पार्थ की,
वासुदेव मुस्काये।
ये कैसा मोह है अर्जुन?
तुम आज तक नहीं निकल पाए.
पथराए मन से,
बोझिल आँखों को बंद किये,
माथे पे सिकन,
गांडीव थामे, अर्जुन खड़े कपकपाये।
लगे अर्जुन गिनाने, हर रिश्ता अनंत बार,
कभी भीष्म, कभी द्रोण,
कभी याद आये मामा शल्य का प्यार।
तो विकराल रूप ले कर भगवान बोले,
खोल अर्जुन अब तू अपनी आँखे।
सृष्टि का तुझको आज सच बतलाऊं,
मन-मस्तिक से तेरे ये भ्रम मिटाऊं।
मेरे सिवा न कुछ, जो अनंत, अमिट हो,
ना कोई ऐसा सृष्टि में,जो अटल और अडिग हो.
फिर इस जगत में ऐसा क्या?
जिसमे तुम अकड़े – जकड़े हो,
किसके प्रेम में बंध के यूँ खड़े हो.
यहाँ ना कोई अपना न पराया है,
सब मेरी और केवल मेरी ही माया है.
मैं ही पर्वत – पहाड़ में,
मैं ही अंत और आरम्भ में.
मैं ही दुर्योधन के दम्भ में,
मैं ही द्रोण के द्वेष में.
मैं ही धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह हूँ,
मैं ही उर्वशी के योवन में.
मैं ही भीष्म का धर्म हूँ,
और मैं ही इन अश्वों के वेग में.
मैं ही प्रेम हूँ,
मैं ही हूँ मन का विकार।
मैं ही मिलन का रस हूँ,
और मैं ही हूँ तन का श्रृंगार।
पर हे अर्जुन,
फिर भी मैं त्रुटिहीन हूँ,
मैं नीरस, निर्जीव,
और श्रृंगार विहीन हूँ.
इस कुरुक्षेत्र में यहाँ,
बस मेरी ही जय है,
मेरी ही पराजय है.
मैं हैं बचूंगा अंत में,
इन सबके अवशेष में.
इनको भी ज्ञान है,
की निश्चित है इनकी हार,
फिर भी देखो,
ये तैयार है करने को मुझपे प्रहार।
इनको भी ज्ञात है,
की मैं ही हूँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड,
फिर भी आ गए है रणभूमि में ये,
रखने अपने इस जीवन का मान.
वो रोकना चाहते है जिस समय की प्रवाह को,
मैं ही वो समय हूँ.
वो खेल रहें हैं अपना खेल जिस धर्म की आड़ में,
मैं ही वो धर्म हूँ.
वो बांधना चाहते है इस धरती पे जिस जीवन को,
मैं चाहता हूँ मुक्ति उस जीवन की.
मैं चाहता हूँ मुक्ति उस धर्म की, उस समय की,
अपने इस ब्रह्माण्ड की, उसके प्रवाह की.
मैं चाहूँ तो मौत दूँ इनको, प्रलय के प्रलाप से,
मैं चाहूँ तो मौत दूँ इनको सूरज के भीषण ताप से.
मगर मैं जानता हूँ इनको संतोष मिलेगा,
तुम्हारे तीक्ष्ण तीरों के घाव पे.
तुम नहीं तो कोई और मेरा साधन होगा,
बिना तुम्हारे ही मेरा लक्ष्य साध्य होगा।
फिर भी तुम नहीं रोक पाओगे इस विध्वंश को,
नहीं देख पाओगे कल से,
अपने प्रियजनों के इस भेष को.
तो उठो अर्जुन,
अपनी तीरों से मेरा पथ प्रज्जवलित करों,
मेरी सृष्टि को आज तुम,
संग मेरे स्वचालित करो.
मुझमे समाहित हो,
मुझमे सम्मिलित हो,
बिना बंधे माया – मोह में,
मेरी तरह प्रवाहित हो.

परमीत सिंह धुरंधर

आनंद


जब दिल टूट जाए, तो माता – पिता की सेवा करनी चाहिए।
धन तो नहीं मिलेगा, पर आनंद जरूर मिलेगा।

परमीत सिंह धुरंधर

Kashmiri girl


If I have to marry a Kasmiri girl, I would not ask her religion. In other words, if every girl were bad, I would chose a Kasmiri girl without asking her age, character and religion.

Parmit Singh Dhurandhar

तो वो खाने लगे, फिर आचार


मेरे सैयां की आँखे ऐसी,
जिसपे डाल दे एक बार,
तो वो खाने लगे, फिर आचार।
मेरे सैयां लगे सावन की फुहार से,
जो मिल ले एक बार,
तो वो अपनी चुनार दे उतार।

परमीत सिंह धुरंधर

पर्दा


कभी मिलो न तुम,
आँखों पे डाल के पर्दा।
सारी रात रखेंगे,
हम दो हाथ का फासला।
दिए सा बन के मन जलता रहेगा,
पर हम ना पट खोलेंगें,
ना तुम लबों से ही कुछ कहना।
कभी मिलो न तुम,
आँखों पे डाल के पर्दा।

परमीत सिंह धुरंधर

आप थे, तो किसी के चुम्बन में भी मज़ा था


जिंदगी के इस दौर में अकेला पड़ गया हूँ,
भीड़ से सजी इस बस्ती में भी मैं तन्हा पड़ गया हूँ.
ए पिता, धीरे – धीरे तेरी चाहत बढ़ने लगी है.
जिंदगी हैं मजबूर अब,
बिना तुम्हारे बोझ सी लगने लगी है.
आप थे, तो किसी के चुम्बन में भी मज़ा था,
बन के भौंरा, मैं भी मंडराता था.
अगर आप होते, तो मैं इठलाता,
अगर आप होते, तो मैं मंडराता,
फूल तो लाखों हैं, पर उनमे अब वो बात नहीं,
रिश्ते तो कई बन रहे, मगर वो मिठास नहीं।
रिश्तों के संगम में भी मैं प्यासा रह गया हूँ.
ए पिता, धीरे – धीरे तेरी चाहत बढ़ने लगी है.
जिंदगी हैं मजबूर अब,
बिना तुम्हारे बोझ सी लगने लगी है.

There is no meaning to have living relationship if you do not have a good relationship with your father.

परमीत सिंह धुरंधर

मेरे पूर्वजों की फितरत ही लुटाने की रही


मुझे राजपूत होने का गुमान नहीं,
पर क्या करें,
लहुँ की मेरे बस पहचान यह ही.
हर बार चाहता हूँ,
अपना ईमान बेंच दूँ.
पर एक आवाज आती है,
ये मेरा काम नहीं.
लोग कहते हैं की मैं अकड़ता बहुत हूँ,
मगर दोस्तों मैं पिघलता भी बहुत हूँ.
एक बार भी किसी ने चुम्मा है मेरा माथा,
हर बार रखा है,
फिर सर को उसके चरणों में वहीं।
आते हैं मुझे लूटने के सौ तरीके,
मगर क्या करें,
मेरे पूर्वजों की फितरत ही लुटाने की रही.
और जब तक महाराणा की साँसे हैं,
मेरे खडग को मेवाड़ में,
मुगलों का साया भी बर्दास्त नहीं.
मुझे राजपूत होने का गुमान नहीं,
पर क्या करें,
लहुँ की मेरे बस पहचान यह ही.

परमीत सिंह धुरंधर

खूबसूरत लड़कियां : मगरमच्छ के आंसू से बन्दर फंसाती है


खूबसूरत लड़कियां एक जाल बिछाती हैं,
मगरमच्छ के आंसू से बन्दर फंसाती है.
पुरुष-प्रधान समाज से इनको है शिकायत,
मगर अपने डैड को परफेक्ट मैन बताती हैं.
नारी के अधिकार पे स्वतंत्र विचार रखने वाली,
ये अपने भाई के प्रेमिका को चुड़ैल बताती हैं.
इन्हे पसंद हैं रहना खुले आसमान के तले,
घोंसलों को बनाना इनके अरमान नहीं,
मगर तीस तक पहुँचते – पहुँचते,
ये शादी – शादी और सिर्फ शादी चिल्लाती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

Perfection


If she can not sense the smell, she is not perfect. And, if she has a good sense of smell, she can not be characterful and trustworthy.

Parmit Singh Dhurandhar

जब तक गुनाह नहीं होगा


जब तक गुनाह नहीं होगा,
कोई तुम्हारा अपना रिस्तेदार नहीं बनेगा।
ये वक्त ही ऐसा है दोस्तों,
जिन आँखों के लिए जी रहे हो,
वक्त आने पे,
वो भी तुम्हारा पहरेदार नहीं बनेगा।
जिस्म की भूख तो गौरेया को भी होती है,
पर शर्म की देवियों से नीचे,
कोई परिंदा भी नहीं गिरेगा।

परमीत सिंह धुरंधर