वो दिवाली भी अकेली थी,
ये दिवाली भी अकेली गुजरी है.
तुम न होती जो ज्वाला गुट्टा,
तो जिंदगी की हर दिवाली अधूरी है.
परमीत सिंह धुरंधर
वो दिवाली भी अकेली थी,
ये दिवाली भी अकेली गुजरी है.
तुम न होती जो ज्वाला गुट्टा,
तो जिंदगी की हर दिवाली अधूरी है.
परमीत सिंह धुरंधर
सारे रिश्ते खामोस हो गए,
हम किसी राह पे,
वो किसी राह के मुसाफिर हो गए.
न कोई खबर, न इल्तिजा,
हम तो तन्हा ही हैं,
पर सुना है,
उनके लाखों रिश्तेदार हो गए.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं दीवाना बहुत था जिन नजरों पे,
वो कातिल बड़ी थी अदाओं से.
मैं ज्यूँ – ज्यूँ उनके नजदीक आता गया,
वो पकड़ती गयीं मुझे हर नब्ज से.
मैं जन्नत समझ के जिसे रुक गया.
वो इतरा -इतरा के फिर,
रखने लगी मुझे ठोकरों में.
मैं सह गया हर सितम जिसकी मोहब्बत में,
उसने करवा-चौथ रखा किसी और के नाम में.
परमीत सिंह धुरंधर
किस्मत से बड़ी है मेहनत,
मेहनत से बड़ा है जज्बा।
हम हारकर भी न बैठेंगे,
ये कह रहा हैं सांगा।
हम लड़ते रहेंगे,
हम बढ़ते रहेंगे।
किस्मत बदले या न बदले,
रुख नहीं बदलेगा ये सांगा।
बंधना मुझे स्वीकार नहीं,
और झुकना मेरा स्वाभिमान नहीं।
जब तक न मिलेगी मंजिल,
यूँ ही भटकता रहेगा सांगा।
मेरा हौसला मेरे साथ है,
कोई साथ आये या नहीं।
मोहब्बत मुझे है यूँ हिन्द से,
की अकेला भिड़ता रहेगा दुश्मनों से सांगा।
परमीत सिंह धुरंधर
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Parmit Singh Dhurandhar
क्या लिखूं तेरे हुस्न पे मेरी जान,
जब से देखा है बेचने लगा हूँ,
250 रूपये किलो दाल.
अब तो सोच लिया है,
फिर से शुरू करूंगा खेती।
बादलों ने भी संदेसा भेजा है,
खूब बरसेंगे मेरी खेतो में,
अब जो रोपूंगा धान.
क्या लिखूं तेरे हुस्न पे मेरी जान,
जब से देखा है बेचने लगा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
ए हिन्द,
तुझे सजाऊंगा मैं.
इसलिए नहीं की तू मेरा है,
बल्कि इसलिए की तू अनोखा है.
दिव्यज्योति है तू इस संसार का,
चमकता है तुझसे ही,
भाल मानवता का.
ए हिन्द,
तुझे सवारूँगा मैं.
इसलिए नहीं की तू अकेला है.
बल्कि इसलिए की तू अलबेला है.
चाँद है तू जीवन के आसमान का,
बिन तेरे अंधेरो में है हर जहाँ।
ए हिन्द,
तुझे सम्भालूंगा मैं.
इसलिए नहीं की मुझे लालच है कोई,
बल्कि इसलिए की तू मेरा गर्व है.
तुझे छोड़ के चाहे जितने भी चले जाए,
दूर किसी के दामन में बसने।
जितने भी चाहे, इल्जाम लगा लें,
अहिषुण्ता का तुझपे।
ए हिन्द,
लौट के आऊंगा मैं.
इसलिए नहीं की मेरा कोई आसरा नहीं है.
बल्कि इसलिए की मुझे तू प्यारा बहुत है.
परमीत सिंह धुरंधर
जब प्रेम प्यास बन जाए,
तो दाल 250 रूपये किलो मिले,
या फिर 950 रूपये किलो मिले,
क्या फर्क पड़ता है?
तो अपना – अपना प्रेम सम्भालो दोस्तों,
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक उनको खोकर।
दाल गलती है, एक दिन सबकी गल जायेगी,
दाल के चक्कर में भात ना गवाना दोस्तों।
भथुआ पे भात खाओ, तीसी पे भात खावों,
रोटी है तो थोड़ा साग भी साथ खाओ.
बस दाम बढ़ा है, कोई अकाल नहीं है यह,
की दाल के चक्कर में रात न गवाना दोस्तों।
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक रात गवाकर।
जब अधरों पे प्यास जग जाए,
तो जाम बेवफाई का हो,
या वफ़ा का,
क्या फर्क पड़ता है?
तो अपना – अपना प्रेम सम्भालो दोस्तों,
मैं आज तक रोता हूँ, बस एक जाम ठुकराकर।
परमीत सिंह धुरंधर
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो शब्दों में बखान नहीं होते,
थाली सोने की हो, या केले के पत्ते की,
माँ के हाथों के बिना, उसमे स्वाद नहीं होती।
हम कितना भी कमा लें पैसों – पे – पैसा,
और एक – से – एक बिस्तर लगालें,
मगर वो सुकून नहीं मिलती।
जो नींद आती थी पुवाल पे गावं में अपने,
वो अब इन हसीनाओं के गोद में नहीं मिलती।
परमीत सिंह धुरंधर
एक बार टूटा दिल मेरा ऐसे,
अब सौ भुजंगों का विष सह लूँ.
नारी के प्रेम से अच्छा है,
मैं शिव सा विषपान कर लूँ.
छल रहीं हैं सारी सृष्टि को,
जाने कब से अपने प्रेम में.
इनके सौंदर्य को निहारने से अच्छा है,
मैं लक्ष्मण सा पर्ितयाग कर दूँ.
बस दिखावा है इनका दम्भ,
अपने चरित्र के मान का.
इनको अपना बनाने से अच्छा है,
मैं शुक सा व्रह्मचर्य धारण कर लूँ.
परमीत सिंह धुरंधर