राममनोहर लोहिया: मैं टकराता चलूँगा


यूँ ही जुल्म को मिटाता चलूँगा,
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।
तुम सत्ता के जिस सिहासन पे बैठो हो,
मैं उसकी जड़ों को हिलाता चलूँगा।
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।
तुम्हारे वादे झूठे, दिखावे और फरेब हैं,
मैं जन-जन को ये बताता चलूँगा।
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।
तुम्हे अगर भूख है गरीबों के लहूँ की,
तो मैं तुम्हारी बागों को उजाड़ता चलूँगा।
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।
तुम्हे गुरुर है जिन गुलाबों के प्रेम पे,
जब तक सांस हैं तन में,
मैं इन गुलाबों को सुखाता चलूँगा।
ए सत्ताधीशों,
सुन लो, मैं टकराता चलूँगा।

परमीत सिंह धुरंधर

लोहिया एक आंदोलन थे


लोहिया एक आंदोलन थे,
जीवन और संघर्ष,
का सम्मलेन थे.
मुस्कराते हुए भी,
कंटीले पथों पे चलकर,
जुल्म के खिलाफ,
खड़ी हुई भीड़ का आभूषण थे.
लोहिया एक आंदोलन थे.
जब भाग रहे थे सभी अंधे हो कर,
गांधी और नेहरू की तरफ.
तब हम जैसे सत्य के सिपाहियों,
के लिए वो एक भगवान थे.
लोहिया एक आंदोलन थे,
अपने आप में सम्पूर्ण जन-आंदोलन थे.
लोहिया एक आंदोलन थे.

परमीत सिंह धुरंधर

चारपाइयों की कसरत


दो पल की आरजू थी,
दो जिन्दगियाँ बदल गयीं।
उनके आँखों के काजल से,
रोशनियाँ बदल गयीं।
ठुकराती रहीं,
ता-उम्र वो मेरी मोहब्बत।
और जब भी मेले में मिलीं,
निशानियाँ बदल गयीं।
आज भी,
घूँघट में उनका चेहरा।
मगर जवानी ढलते-ढलते,
कई कहानियाँ बदल गयी.
चारपाइयों की कसरत,
भले मैंने नहीं की है.
पर दिया बुझाते-बुझाते,
कई चारपाइयां बदल गयीं।

परमीत सिंह धुरंधर

ये नए लोगो की मोहब्बत


रिश्ते अगर झूठे हों,
तो उनको सींचना ज्यादा होता है.
धागे अगर कच्चे हों,
तो सहेजना ज्यादा होता है
ये नए लोगो की मोहब्बत,
इसमें रातों को, मिलना
कुछ ज्यादा होता है.
गहरी न हो जड़ें तो,
वृक्षों का टूटना ज्यादा होता है.
ये नए लोगो की मोहब्बत,
इसमें रातों को, मिलना
कुछ ज्यादा होता है.
पत्र सीमा से किसी फौजी का लेकर,
डाकिया घर तक लाता है.
उसे बिना खोले ही कोई,
काफी देर तक चूमता है.
ये नए लोगो की मोहब्बत,
इसमें ओठों और जिस्म का,
मिलना – मिलना, ज्यादा होता है.
ये नए लोगो की मोहब्बत,
इसमें रातों को, मिलना
कुछ ज्यादा होता है.

परमीत सिंह धुरंधर

हाँ -पे-हाँ कहलवाया है


सारी रात,
सारी रात दिया जलाकर,
बलम ने मुझे बस सताया है.
टूटी एक – एक कर,
टूटी एक – एक कर चूड़ी कलाई में,
निर्मोही ने ऐसे नचाया है.
ना सोई,
ना सोई न ही करवट बदल पाई,
बस हर घड़ी हाँ -पे-हाँ कहलवाया है.
सारी रात दिया जलाकर,
बलम ने मुझे बस सताया है.

परमीत सिंह धुरंधर


उनकी जुल्फों में बंधकर, समंदर भी स्थिर,
जाने प्यास मिटेगी, या होगा आज मंथन।

परमीत सिंह धुरंधर

सीने पे किताबे तू रखने लगी है


राहें – निगाहें सब उठने लगी हैं,
दुप्पटे में जब तू निकलने लगी है.
नजरे झुकाकर, उमर को छुपाकर,
सांझो – पहर जब निकलने लगी है.
मंदिर – मस्जिद सब सुने पड़े हैं,
निगाहों में काजल जो तू रखने लगी है.
जुल्फों को बाँध कर, चुनरी को भींचकर,
बदल कर गलियां, आने – जाने लगी है.
कब तक बचेंगे, कितने बचा लेंगे,
घर-घर में दीवारे उठने लगी है.
बच्चों की अम्मा, बच्चों के अब्बा,
अब तो,
दादा – दादी में दरारें परने लगी है.
जब से सीने पे किताबे तू रखने लगी है.
राहें – निगाहें सब उठने लगी हैं,
दुप्पटे में जब तू निकलने लगी है.

परमीत सिंह धुरंधर

अकेला


तन्हा-तन्हा सा हूँ, तन्हाई लिए,
मैं अकेला ही हूँ शहर में, ये शहनाई लिए.

परमीत सिंह धुरंधर

ख़्वाब


जब से सीना तुम्हारा उभरने लगा है,
गावं से शहर तक मौसम बदलने लगा है.
दुप्पटे के रंग से ही घायल हो रहे है यहाँ कितने,
और कितने,
बाँहों में भींचने का ख़्वाब सजोने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

तेरे साथ की


मुझे जो कभी समझा ही नहीं वो रातें तेरे साथ की,
घड़ी-घड़ी याद आती है वो बातें तेरे साथ की.
समुन्दर बन गया है दर्द मेरा बढ़ – बढ़ के,
फिर भी मिट नहीं सकती वो चाहत तेरे साथ की.
होठ चाहे तेरे, जिसका भी जिस्म चुम लें,
मेरे ओठों को बस प्यास है आज भी तेरे सांस की.
घड़ी-घड़ी याद आती है वो बातें तेरे साथ की.

परमीत सिंह धुरंधर