कलम उठा ली है,
तो भय क्या फिर तलवार का.
जब आ गए हैं सागर की लहरों में,
तो फिर सहारा क्या पटवार का.
चाँद साँसों के लिए,
नहीं झुकने देंगे ये अपना तिरंगा।
जब मौत ही निश्चित है,
तो फिर भय क्या क़यामत का.
परमीत सिंह धुरंधर
कलम उठा ली है,
तो भय क्या फिर तलवार का.
जब आ गए हैं सागर की लहरों में,
तो फिर सहारा क्या पटवार का.
चाँद साँसों के लिए,
नहीं झुकने देंगे ये अपना तिरंगा।
जब मौत ही निश्चित है,
तो फिर भय क्या क़यामत का.
परमीत सिंह धुरंधर
हौसलें टूटते रहें,
पर लड़ाइयां लड़ी जाएंगी।
दुःख ही मिलेगा मगर,
चढ़ाइयां तो की जायेंगीं।
कोई साथ आता हैं तो आये,
या फिर साथ ना आये.
अपने साँसों के बल पे ही,
उचाईंयां नापी जाएंगी।
एक दीप तो जले कहीं,
फिर दीपमाला बनाऊंगा मैं।
रणभूमि तो सजें कहीं,
फिर रौंद के जाऊँगा मैं।
स्वतः के बलिदान से ही सही,
मगर ये बेड़ियां तोड़ी जाएंगी।
हौसलें टूटते रहें,
पर लड़ाइयां लड़ी जाएंगी।
परमीत सिंह धुरंधर
रौशनी में दिवाली तो हर कोई मनाता हैं,
अंधेरों में दिया जलाना हमें आता है.
अपनी किस्मत पे गुमान करने वालो,
किस्मत के साथ जुआ खेलने का मज़ा हमें आता हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी की मस्ती में मैं बहता चला,
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
मैं गिरता रहा, गिर कर उठता रहा.
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
लाखों राहें हैं मेरे लिए यहाँ बनीं,
पर मैं इन राहों का मुसाफिर नहीं.
उठ जातें हैं मेरे कदम खुद-ब-खुद उस तरफ,
जिस तरफ अंधेरों ने रखी है अपनी पालकी.
फूल कोई मेरी किस्मत में नहीं, ये जानता हूँ,
इसलिए बहारों से कोई रिश्ता, मैं रखता नहीं.
काँटों से उलझता हूँ मैं मुस्करा-मुस्करा कर,
की नशों में मेरे लहूँ की कमी नहीं.
ज़माने को ये नहीं हैं अंदाजा,
की ठोकरों में उसके हर हस्ती को, मैं तौलता चला.
जिंदगी की मस्ती में मैं बहता चला,
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
मैं गिरता रहा, गिर कर उठता रहा.
मुझे कोई क्या रोक सकेगा भला.
परमीत सिंह धुरंधर
भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.
खुरों से रोंद्ती,
उड़ाती हुई,
धूलों को.
अपने सींगों पे,
उछलती,
हवाओं के दम्भ को.
योवन से भरपूर,
उन्नत अपने स्तनों से,
विषधर को भी,
पागल कर देतीं हैं.
भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.
काली हैं,
पर मतवाली हैं.
घंटों, तालाब में बैठी,
पगुराती हैं.
हरी – हरी दूबों को,
चरती, लहराती,
दो नयनों से अपने,
उपवन को मधुवन,
बना देती हैं.
भैंसे,
दौड़ती हुई,
आनंद देतीं हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
Who cares?
Whether you marry one,
Or seven.
It’s your choice.
Who cares?
You wear saree,
Or run naked.
It’s your choice.
Who cares?
Whether you play chess whole night,
Or have a sex.
It’s really your choice.
Who cares?
Whether you use Ranveer Singh, Ranvir Kapoor,
Or family of Padukon.
It’s your choice.
Who cares?
Whether you are kissing Sunny Deol,
Or Sunny Leyon.
It’s your choice.
But I know you will not be able to listen,
When your daughter-in-law will tell her choices.
When your hubby will tell his choices.
When your guy will be someone’s else choice.
Parmit Kumar Singh
नए जवाहरलाल हैं,
अपने केजरीवाल।
सबको निकाल बहार करेंगे,
खुद करेंगे राज.
मुफ्त मिलेगा खाना सबको,
मुफ्त मिलेगा आनाज,
लेना है अगर सब मुफ्त तो,
फिर मत पूछो सवाल।
बोतल नयी है पर,
उसमे वो ही पुरानी है शराब।
तुम लो बस तीन आना,
और हम लगाएं गुलाब।
नए जवाहरलाल हैं,
अपने केजरीवाल।
सबको निकाल बहार करेंगे,
खुद करेंगे राज.
अन्ना को छोड़ा, भूषण को तोडा,
योगेन्द्र यादव को दी है लात.
आज भी नहीं सुधरेंगे तो,
कल ये भी हो जाएंगे श्यामा प्रसाद।
नए जवाहरलाल हैं,
अपने केजरीवाल।
सबको निकाल बहार करेंगे,
खुद करेंगे राज.
परमीत सिंह धुरंधर
I believe that New Zealand will win based on the similarity between the WC-1987 and WC- 2015.
Parmit Singh Dhurandhar
ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा,
जब भोर हुई, तुम प्यारी लगी,
सूरज की प्रखरता सी.
जब रात हुई, तुम मधुर लगी,
चाँद की शीतलता सी.
इस नीरस जीवन में, तुम पुष्प सी,
सुगन्धित हो.
हर दोपहर की धुप में, हवा के,
थपेड़ो सी संग हो.
ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा,
मेरे ह्रदय के हर दुःख में,
मेरे कापंते अधरों की तमन्ना हो.
मेरे हर सुख में, तुम मेरे,
बाहों का मंथन हो.
ओ प्रियतमा,
ओ प्रियतमा।
परमीत सिंह धुरंधर
सुरेश रैना के लिए धोनी और ग्रेग चैपल में वो ही अंतर है जो एक सौतेले बाप और बाप में है.
परमीत सिंह धुरंधर