बेचैनी


तुम्हे इतना प्यार दिया है,
की अब निगाहें धरती पे हैं.
रातों को दिया जल के,
बेचैनी मेरे सिराहने पे है.

परमीत सिंह धुरंधर

रातों का दाग


खूबसूरत जिस्म पे,
अब भी है,
रातों का दाग.
खिड़कियाँ,
बंद ही रहने दो.
मुझे उजालों की नहीं,
अब भी,
इन ओठों की हैं प्यास।
ऐसा क्या है,
इन दिन- दोपहर में,
जो तुम मुझसे दूर भागती हो.
मत डालो,
ये उतारी हुई चुनर,
मुझे अब भी हैं,
इन अंगों की तलाश।

परमीत सिंह धुरंधर

वफ़ा


उनकी आँखों से नशा लेकर,
रातो को वफ़ा देता हूँ.
मोहब्बत ही कुछ ऐसी है,
की साँसों -साँसों में जीता हूँ.
बखान नहीं हो सकता शब्दों में,
रिस्ता उनसे, ये मेरा।
हर पल में उनसे मैं,
अंजाना सा मिलता हूँ.
अब कल ही की तो बात है,
जब वो पास आयीं थी.
बाहर बरस रहे थे बादल,
अंदर एक दम, नयी उनकी अंगराई थी.
उनके जुल्फों के बोझ से दबा मैं,
और मेरे घुटते साँसों पे वो मुस्कराई थीं.

परमीत सिंह धुरंधर

Women’s Day


There is no use in celebrating “Women’s Day” until and unless:
Kareena Kappor understands the pain of Amrita Singh,
Hema Malini understands the pain of Prakash Kaur,
Rekha understands the pain of Jaya Bhaduri,
Soniya Gandhi understands the pain of Menka Gandhi,
Sridevi understands the pain of Mona Kapoor,
Kiran Rao understands the pain of Reena Dutt,
Lara Dutta understands the pain of Shveta Jaishankar,
Sarika understands the pain of Vani Ganapathy,
Gouthami Tadimalla understands the pain of Sarika,
and ……
Until and unless an Indian woman understands the pain of another woman, just tagging a photo or writing about “Women’s Day” and women power is meaningless.

Parmit Singh Dhurandhar

दुल्हन


भोर भइल बा बालम मोहब्बत में,
शाम होखे दीं तानी शरारत से.
रात होते -होते दिल भुला जाई,
का -का छुटल बा एकर मायका में.
डोली चढ़त त दिल कापत रहल की,
कैसे कटी जिन्दगी माई बिना ससुरा में.
अब त दिल ई कहता की काहे न तानी,
जल्दी आईनी रउरा ई अंचरा में।
प्यार जागल बा बालम,
तन-मन में जउन रउरा छुवन से.
तानी देखे दीं,
जी भर के दर्पण में.
रात होते -होते मन मचले लगी,
रउरे बाहों की दुनिया में.

परमीत सिंह धुरंधर

In these lines, I am trying to imagine what a girl is saying to her husband after her first night. What was her feeling when she left her parent’s house to join a new family.

महिला दिवस


महिला दिवस के दिन हर एक पुत्र को अपने पिता को नमन करना चाहिए, जिन्होंने उसके जीवन में  ममतामयी माँ और प्यारी बहनों का प्यार दिया.

परमीत सिंह धुरंधर

विद्रोही और प्रेम


विद्रोहियों की कोई जात नहीं होती,
इनकी कोई विसात भी नहीं होती।
पर बैठ नहीं सकते ये चैन से,
किसी भी परिस्थिति में,
इनको चैन नहीं मिलती।
अगर रोकना हैं इनको,
तो आप इनको मोहब्बत करा दो.
क्यों की वहीँ,
इनसे कोई विद्रोह नहीं होती।
उलझ के रह जाते हैं,
अपने ही दिल-दिमाग के जाल में.
भूख के खिलाफ लड़ने वाले,
विद्रोही की प्रेम में कोई औकात नहीं होती।
सिर्फ पुष्पों, सिद्धांतों, और नारी-सम्मान पे बोल के,
भारतीय नारियों का दिल नहीं जीता जा सकता।
और इनके जेब से,
सोने-चांदी के तोहफे खरीदी नहीं जाती।
तभी तो कोई स्त्री, किसी विद्रोही से प्रेम नहीं करती।
आवाज धीरे -धीरे कम हो जाती है,
घुट-घुट कर वो खुद से ही,
हतास-निराश  हो जाती हैं.
और फिर एक दिन,
किसी अनजान से मोड़ पे,
विद्रोही के प्राण ही विद्रोह कर देते हैं.
लावारिस, अंजाना,
ना कोई देखने वाला, ना पहचानेवाला,
और अंत में इस तरह, एक विद्रोही की आवाज,
अनंत में सम्मिलित हो जाता है,
उदासी और हार के आवरण में ढक कर.
और समाज फिर चल पड़ता है,
उस विद्रोही की भुला कर.
और वो नाचने लगती हैं,
रईसो के दरबार में.
जिन बेड़ियों को तोड़ने के लिए,
जीवन भर विद्रोही ने विद्रोह किया।
उन्ही को अपने गोरे और नाजुक पावों में,
घुंघरू बना कर.

परमीत सिंह धुरंधर

पिता-पुत्र की जोड़ी


वो पिता-पुत्र की जोड़ी,
बड़ी अलबेली दोस्तों।
एक अर्जुन,
एक अभिमन्युं दोस्तों।
एक ने रौंदा था,
भीष्म को रण में.
एक ने कुरुक्षेत्र में,
कर्ण-द्रोण को दोस्तों।

परमीत सिंह धुरंधर

बहुत तेरी यादें आती हैं पिता


बहुत तेरी यादें आती हैं पिता,
राहें जितनी काली, उतनी ज्यादा।
मन तो करता हैं, सब तोड़ के रख दूँ,
पर फिर, अकेला पर जाता हूँ पिता।
ठोकरों में गिरता ही हूँ रहा,
ठोकरों में गिर ही मैं रहा.
जख्मों पे जब भी मलहम लगता हूँ मैं,
आँखों में तुम ही छलक आते हो पिता।

परमीत सिंह धुरंधर

चुम्बन : दांतों का खेल


वो एक कातिलाना,
अंदाज रखती हैं,
मेरे लहू की,
एक प्यास रखती हैं.
लोग कहते हैं जिसे मोहब्बत,
उस शम्रो-हया के पीछे जाने,
वो क्या -क्या ख़्वाब रखती हैं.
वो टकराती हैं राहों में,
अपना दुप्पट्टा लहरा के.
हम अपनी नजरे झुका के चलें,
तो भी शरीफ नहीं।
अपनी शराफत के पीछे जाने,
वो कैसे-कैसे नकाब रखती हैं.
दांतों का खेल है,
चुम्बन मोहब्बत में,
तभी तो बुड्ढों पे वो,
खिलखिला के हंसती हैं.
हम जैसे जवानों की जल रही है,
हसरते कुवारीं।
और ओठों की अपने ही दाँतो से,
वो दबा के रखती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

Kissing your partner has no meaning if your teeth are not involved in that.