बढ़ा चल-बढ़ा चल


दर्द ही अगर जिंदगी है तो मोहब्बत खुले आम कर,
शौक ही अगर तेरा यह ही है तो बेवफाई का न गम कर.
हौसले अगर पस्त ना हुए हो तेरे तो बढ़ा चल, बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.
खूबसूरत चेहरे चाँद से और आँचल उनका बादल सा,
बरस गए तो किस्मत तेरी वरना नए मानसून का इंतज़ार कर.
शहीद हुए कितने इन राहों में कौन आंसू बहता है,
मौत से जो निर्भय है वो ही हुस्न से दिल लगता है.
बेवफाओं की इस बस्ती में कितने उजड़ गए,
किस -किस का जिक्र करें और कहाँ -कहाँ करें।
तू अपनी सोच, मंजिल पे नज़र रख, बढ़ा चल-बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.

 

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


किनारों की चाहत में तैरने वालो में हम नहीं,
बैठें हैं मज़धार में, डूबनें वालों में हम नहीं।
कष्ट होगा मुझे जितना लिखा हैं,
मोतियों को पाने से किस्मत बदलती नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


तेरी मोहब्बत में क्या लिखे,
हो भी लिखता हूँ मिट जाता है.
मैं तो खुद डूबा हुआ हूँ,
दूसरों को यहाँ क्या बचाएं।

परमीत सिंह धुरंधर

जोबन


तेरी दो पलकें सागर सी, नए-नए मयखाने हैं,
उमरिया सारी तुझको दे दूँ, पढ़ते रह फिर पाठशाले में.
मत पूछ राही मन से मेरे जोबन में रस है कितना,
दिल को तेरे सींच दूँ, ठहर दो पल, पथ है लम्बा।
फूल – पाती रख ले सब अपने झोले में भर के,
मेरे अंगों पे तो सोना, पीतल सब है पिघला।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जय गणपति-जय मंगलमूर्ति


पापों से मुक्ति,
ज्ञान और भक्ति,
सब मुझको दीजिये,
हे गणपति.
मैं हूँ आपका सेवक,
आप मेरे स्वामी,
हे अधिपति।
मेरे मस्तक में,
प्रवाह करो,
ह्रदय में मेरे,
वास करो.
आँखों में ज्योति,
हो तुम्हारी,
साँसों में संस्कार,
भरो,
हे मंगलमूर्ति।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माही


शैतान माही की चंचल शैतानियाँ,
सीधे से मनु की कीमती नादानियाँ,
उसपे से बाबूसाहब की कभी न खत्म,
होने वाली लम्बी कहानियाँ।
हसीं पल वो लौट के नहीं आ रहे,
पर छोड़ गए हैं धड़कनो पे गहरी निशानियाँ।
चावल, दाल, सब्जी, और उसपे चलती थी,
भाभी के हाथों से मीठी मछलियाँ।
वो स्वाद, वो एहसास, वो मिठास,
अब कहाँ सजने वाली हैं,
रसोई में मेरे ये खनकती थालियाँ।

परमीत सिंह धुरंधर

मन का प्रेम


अब अकेले खाने का मज़ा आएगा,
हर कौड़ किसी की याद लाएगा।
ये कोई बदन का दर्द नहीं,
की योग करके मिटा दूँ.
ये तो मन का प्रेम है,
अब आत्मा के साथ ही जाएगा।

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब कहाँ चलती है गोलियाँ मोहब्बत में,
हमें तो शौक है अब उनकी गालियों का.
आज भी जब गुजरता हूँ उनकी गलियों से,
तो भर जाती हैं मेरी झोलियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


बुलंदियों का इतना है शौक मुझे,
की समझ नहीं पाया मोहब्बत को.
कभी-कभी तो वो मिलती थीं,
मैं सुनाने लगता था अपनी शोहरत को.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


पर्वतो के पास हैं हज़ारों नदियाँ,
वृक्षों के पास है लाखो शाखाएं।
मेरी माँ का एक मैं ही हूँ सहारा,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।
रात के पास है चाँद-तारे,
दिन को मिला सूरज की निगाहें।
माँ की उम्मीद सिर्फ मैं हूँ,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।

 

परमीत सिंह धुरंधर