वक्त और किस्मत


वक्त के बदलने का इंतज़ार मत कर मुसाफिर,
वक्त और किस्मत में एक ही भेद है.
वक्त किसी का मोहताज़ नहीं होता,
और किस्मत पे किसी का जोड़ नहीं होता.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब कहाँ चलती है गोलियाँ मोहब्बत में,
हमें तो शौक है अब उनकी गालियों का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास


तुम्हें दर्जनो की मोहब्बत मिले,
मैं यूँ ही प्यासा भटकता रहूँ।
तुम्हें चाँद-तारों की रोसनी मिले,
मैं यूँ ही अंधेरों में जाता रहूँ।
मेरी मोहब्बत ही सच्ची थी,
पर मैं सोना-चांदी नहीं ला सका।
तुम्हें सोहरत मिले, तुम्हें दौलत मिले,
मैं यूँ ही फकीरी में तेरी चित्र बनता रहूँ।
तमन्ना थी की आँखों का काजल बनूँ,
जुल्फों का गजरा, होठों की लाली बनूँ।
तेरा सौंदर्य सदा सबकी प्यास जगाता रहे,
मैं यूँ ही आँसुंओं से प्यास मिटाता रहूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दिल के कच्चे


मत पूछो,
मेरी जवानी के किस्से,
मोहल्ले के सारे अपने,
ही बच्चे हैं।
क्या हुआ,
जो कहते हैं,
हमें वो चाचा.
कमबख्त,
खून के ये रिश्ते,
ऐसे ही,
अच्छे हैं.
महफूज है मेरी बाहों में,
आकर ये.
ये इनकी माँ भी जानती हैं,
की हम आज भी,
दिल के कच्चे हैं.
दर्द तब होता है,
जब वो कहती हैं, मियां,
और तुरंत कहती हैं,
अलबिदा।
मुस्काती हैं ये सोचकर,
की हम आज भी उनके,
धागे से बंधें हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नज़र


उनके नज़र से नज़ाकत ऐसे खो गयी,
रूह मेरी थी वो क़यामत ढा गयी.
रुख ऐसे मोड़ा की क्या बताऊँ,
दिन में ही मुझे चाँद-तारे दिखा गयी.
मोहब्बत की अब नहीं है कोई तमन्ना,
वो एक रात ऐसे अपने होठों से पीला गयीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यासा


लो,
दर्द के अपने कुछ किस्से,
आज तुम्हे भी सुना दूँ.
जो कुछ मीठा है मेरे पास,
आज तुम्हे भी चखा दूँ.
मुझे अब भूख नहीं लगती,
और तुम आज भी भूखे हो.
तो लो,
बैठो।
अपनी थाली में से कुछ,
आज तुम्हे भी खिला दूँ.
खा लो,
पर अब पानी मत माँगना.
वो मेरे पास मीठा नहीं,
खरा है.
तुम प्यास मिटाने के लिए जी रहे,
मैं प्यासा ही जी रहा हूँ.
की उसे पी कर,
मैं आज तक,
प्यासा ही जी रहा हूँ,
प्यासा ही जी रहा हूँ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

आज की नारी


आज की नारी को बच्चों से ज्यादा सुन्दर जिस्म की चाहत है,
और उनके बच्चों को सेरेलेक्स -फारेक्स से राहत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

सूरज


ए कलम,
क्या लिखूं,
उनकी खूबसूरती पे.
जब भी मिलीं,
सारे दिए बुझ गए.
चाँद भी निकलता है,
तो तारो को साथ ले के.
वो तो एक सूरज थीं,
जब भी निकलीं,
सारे सितारे डूब गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ ने पुकार है आज पुत्र कह के तुझे,
और क्या फिर ख़िताब चाहिए।
ये सारी सल्तनत रख ले तू खुदा,
मुझे बस मेरी एक माँ चाहिए।
जिसके चरणों में गंगा – यमुना,
और हाथों में हर एक धाम है.
अपने हाथों से आज खिलाया है तुझे,
और क्या फिर मान चाहिए।
ये सारी सल्तनत रख ले तू खुदा,
मुझे बस मेरी एक माँ चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

रात


ये मत पूछ की वो कितने रात मेरे पास थीं,
ये पूछ की जब वो साथ थीं तो कैसी रात थी.
न खुद सोयी न मुझे सोने दिया,
सारी रात वो चुप थीं, और मैं भी खामोश था.
दिन – भर जो पहनती थी इठला -इठला कर,
रातों को मैंने, सोना-पीतल सब झाड़ लिया.
ये मत पूछ की मैंने कितने रात लूटें सोना-चांदी,
ये पूछ की मैंने क्या -क्या नहीं लुटा.

 

परमीत सिंह धुरंधर