रावण


मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
वो कैलाश पे विराजे,
मेरे बुलंद हैं इरादे।
उनके ही छात्र-छाया में,
मैं बढ़ रहा निरंतर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
उनके ही चरणों में,
मैं सर हूँ नवाता।
उनके ही दर्शन से,
मेरा भाग्य खिल जाता।
मैं पुत्र उनका हूँ,
अज्ञानी – अपराधी।
और वो पिता हैं मेरे,
धर्म – ज्ञान के धुरंधर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट शिव-शंकर।
कैलाश को उठाया,
अपने बाजुओं पे.
त्रिलोक को दला है,
मैने अपने बल से.
सब-कुछ है समर्पित,
भोलेनाथ के चरणों में,
उन्ही की आशीष से है,
मेरे साँसों का ये समंदर।
मैं वीर हूँ भयंकर,
मेरे इष्ट है शिव-शंकर।

 

परमीत सिंह धुरंधर

अब जीने का मन नहीं


अकेला हूँ, थका हूँ,
शिकायत करूँ, तो कहाँ,
हर तरफ से ,
ठुकराया हुआ हूँ।
तमन्नाएँ इतनी पाल ली,
की उनके बोझ से दबा हूँ। 
ख़्वाब इतने देखे,
की उनके टूटने से, जख्मी हूँ। 
चाँद ऐसा मिला, सफर में,
की उसके छुपने से,
अंधेरों में बैठा हूँ। 
जमाने से इतनी दुश्मनी,
की हर राह में अकेला हूँ। 
जवानी की मस्ती में इतना दौड़ा,
की पावों में अब दम नहीं।
इतना उड़ा आसमा की चाहत में,
की साँसों में दम नहीं।
कमबख्त ये दिल मेरा,
उनकी मोहब्बत में इतना डूब गया,
की अब,
किनारों तक पहुचने का दम नहीं।
की अब जीने का मन नहीं,
की अब जीने का मन नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर 

मीत बनके


बाग़ में गयी थी कल सखी मैं फूल तोड़ने,
कोई पावों को चुम गया मेरे शूल बनके।
छत पे गयी थी कल सखी मैं गेहूं छांटने,
आँखों में बस गया कोई मेरे धूल बनके।
पनघट पे गयी थी कल सखी मैं पानी भरने,
जोवन को चख गया कोई मेरे जल बनके।
कैसे कहूँ घर में ये सारी बातें, की
ह्रदय में रहने लगा है कोई मेरे मीत बनके।

परमीत सिंह धुरंधर 

मुह-दिखाई


ऐसे नाहीं,
वैसे नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
चढ़ाई हमपे,
ए राजा जी.
ए ने नाहीं,
वो ने नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
दिखाई हमके,
ए राजा जी.
मत कुछ सिखाई,
ना बाताई,
ए राजा जी.
पाहिले रखीं,
एहिजा मुहवा-दिखाई,
ए राजा जी.

परमीत सिंह धुरंधर 

जिंदगी


दौलत की जितनी है,
मुझे चाहत,
उतनी दौलत कहाँ,
मिलती है.
माँगा है जिसे,
मोहब्बत में,
वो अब कहाँ,
दिखती है.
अरे प्यारों,
ये ही तो है जिंदगी,
ये कब हमारी मुठ्ठी में,
बंद रहती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर 

संसार


तुझको प्यार ही नहीं,
मैं संसार कहता हूँ,
तू मेरी चाहत है,
ये खुले आम कहता हूँ.
ये जान कर भी,
की तू मेरी नहीं है,
तेरे तिब्बत पे मैं,
अपना अधिकार कहता हूँ.
माना की कभी तू बाहों,
में नहीं आएगी मेरे,
पर मैं आज भी तेरे,
क्रीमिया पे निगाहें रखता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

सोलह साल


१५ ऑगस्त पे,
ए कलम,
क्या लिखूं,
आज.
तेरी ही स्याही,
अलख जगाती,
और,
गिराती है ताज.
क्या कहूँ उनपे,
जो जला गए स्वाधीनता,
की आग.
क्या नापूँ उनको,
जो माप गए सूरज,
और चाँद।
ये कोई चन्द बिन्दुओं,
को मिलाती रेखा नहीं,
ये तो वो मानचित्र है,
जिसपे लूटा दी,
माताओं ने पानी गोद,
और सुहागिनों ने,
अपनी सुहाग।
ए कलम,
क्या लिखूं,
उन वीरांगनाओं पे,
आज.
जिन्होंने जौहर खेली,
जब उम्र थी, केवल
सोलह साल.

परमीत सिंह धुरंधर 

1957


बहुत सुने हैं,
हमने,
किस्से ५७ के,
संग्राम की.
ऐसे लड़े थे,
मेरे पुरखे,
की,
एक था रंग,
सुबह और शाम की.

परमीत सिंह धुरंधर 

धरती भारत की


जहाँ गंगा की हर धार में,
खेलती है जवानी,
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ शंकराचार्य ने,
वेद गढ़े,
और नानक ने,
दिए गुरुवाणी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ पहन केशरिया,
भगत सिंह, निकले दुल्हन लाने,
और जीजा बाई ने दी,
शिवा जी को शिक्षा अभिमानी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ और भगत सिंह


तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।

परमीत सिंह धुरंधर