भारत


विश्व भारती,
ये है धरती,
राम-रहीम जहाँ,
एक साथ खेले.
लहराने को तिरंगा,
वीर यहाँ,
हँसते-हँसते,
झूल गए.
देखो इस हिमालय को,
हमने जिसका मान रखा,
अपने लहू से रंग दिया,
जब-जब इसका शान घटा.
विश्व भारती,
ये है धरती,
जहाँ बड़े- बड़े संग्राम हुए.
और यहीं पे,
बुध-महावीर ने,
शान्ति के पाठ पढ़ें.

परमीत सिंह धुरंधर 

परिन्दें


परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

आँख-मिचौली


इश्क़ इस कदर नाकामियों में पल रहा है,
की मैं मौत से मोहब्बत मांग रहा हूँ.
वो भी खेलने लगी है अब आँख-मिचौली,
जिससे मैं अपना दिल लगा रहा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

ये बैल नहीं


ये बैल नहीं,
ये बैल नहीं,
ये बैल नहीं,
मेरे जवानी का,
दम्भ हैं.
मेरी आँखों की,
ज्योति,
ह्रदय की धड़कन,
और मेरे मुख का,
तेज हैं.
इनके घुंघरू से,
उठती है सीने में,
मेरे ज्वाला।
मेरे रातो का,
ख़्वाब,
दिल का,
अरमान,
और मेरी जवानी का,
अहंकार हैं.
झूमते हैं,
बहते हैं,
सींगो को लड़ा के.
मलते हैं,
दलते हैं,
उछाल -उछाल के.
मेरे खेतों का,
बहार,
मेरे आँगन का,
श्रृंगार,
और मेरे जीवन का
त्यौहार हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

मेरे बैल


मेरे बैलों ने आज फिर से,
अपनी ताकत दिखाई।
देख के हरियाली,
सावन बरसने चली आई.
जब आस मेरी टूटती है,
तो ये झूम – झूम के बहते हैं.
जब सांस मेरी थकती है,
रुक -रुक के ये बहते हैं.
मेरे बैलों ने आज फिर से,
अपनी मोहब्बत दिखाई।
देख के मेरे तन पे पसीना,
वो आँचल लिए दौड़ी आई.

परमीत सिंह धुरंधर 

इल्तिजा


इतना भी मत लूटो,
की जीवन ही न रहे,
कुछ तो साँसे रहने दो,
दफनाने से पहले।
बड़ी शिद्दत से तुम्हे चाहा था,
बड़ी शिद्दत से तुमने लूटा है,
कुछ तो मुद्दत दे दो,
ताकि ये आसूं कब्र में न निकले।

परमीत सिंह धुरंधर 

ख़ास जिंदगी


थोड़ी – थोड़ी आग है, थोड़ी सी बरसात है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
ठोकरें भी मेरे हौसले तो नहीं तोड़ पाती हैं,
काँटों के बीच में ही तो कलियाँ मुस्काती हैं.
थोड़ी – थोड़ी आस है, थोड़ी सी प्यास है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
टूटते ख़्वाब भी नहीं मुझे रोक पाते हैं,
काँटों के बीच में ही तो फूल मुस्काते हैं.

जलता दीपक


मेरी सारी दौलत ले कर,
वो सोहरत मुझे लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मेरे कानों में,
की ये जलता दिया बुझा दो,
वो जलता दीपक बुझा दो.
मेरी सारी खुशियां ले कर,
वो ग़मों की राते लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मुझसे,
की वो खुली किवाड़ भिड़ा दो,
वो खुली किवाड़ भिड़ा दो.

परमीत सिंह धुरंधर 

राखी


एक छोटे से मंदिर में,
एक छोटे से बच्चे के,
नन्हे हाथों पे,
प्रेम के दो धागे,
बाांध के बहना बोली।
की, भूल न जाना भैया,
उठा के मेरी डोली।

परमीत सिंह धुरंधर

मैं नहीं हूँ


मंजिलों को पाने के लिए,
समझौतों पे समझौते हुए.
एक बार मंजिल मिल जाए,
तो फिर,
कौन अपने, कौन पराये।
ये वसूल रखने वालों की,
भीड़ में मैं नहीं हूँ.
एक ही समय में खाता हूँ,
सेवइयां और मछलियाँ, दोनों
ईद और दिवाली के,
इंतज़ार में बैठा कोई,
मजहबी मैं नहीं हूँ.
और उठता हूँ आज भी,
माँ की लोरी सुन कर,
रेडिओ मिर्ची और एफ. एम.,
से जागने वालो की,
जामत में मैं नहीं हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर