शिव


जहाँ शिव हैं, वहाँ शक्ति.
तुम निश्छल हो बाबा,
हम बंधे हैं लोभ से.
जहाँ शिव हैं, वहाँ भक्ति.
तुम महाकाल हो बाबा,
हम भयभीत है काल से.
जहाँ शिव है, वहाँ मुक्ति.

परमीत सिंह धुरंधर

सैया उहे खत्री


ए सखी हमरा ता चाहीं सैया हलवाई हो,
हर दिन छानी जलेबी, और हमके खिलाई हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं पियवा अनाड़ी हो,
अपने ठिठुरी आ हमके ओढ़ाई रजाई हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं बालम पनवारी हो,
बात – बात पे जे धरी हमके अक्वारी हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं सजना बिहारी हो,
अरे बिहारी चाही तहरा, काहे हो.
ए सखी हमरा ता चाहीं सजना बिहारी हो,
लाखों में एक होलन रसिया बिहारी हो.
ए सखी हमरा चाहीं सैया उहे खत्री हो,
धुप हो – छाव हो, हर पल लगावे जो छतरी हो.

परमीत सिंह धुरंधर

रतिया में सैया


रतिया में अइलन सैया देवर नियर,
हम कइनी हुकूमत, उ सजा कटलन।
रतिया में अइलन सैया सास नियर,
हम कइनी जुलुम, उ चूल्हा – चाकी कइलन।
रतिया में अइलन सैया ससुर नियर,
हम सुनइनी दस गो बतिया, उ चुप-चाप सुनलन।
रतिया में अइलन सैया बलमा नियर,
हम सुतनी तान के, उ अगोरत बइठलन।

परमीत सिंह धुरंधर

दुल्हन


जो दर्पण को देख कर शर्मा जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो झुकी पलकों से भी दिल को छू जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जब लौटूं मैं हल लिए काँधे पे,
दिनभर का थका हारा,
तो वो मंद – मंद मुस्करा कर,
अभिनन्दन करे दरवाजे पे,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो काजल भी लगाये आँखों में,
मेरी आँखों में आँखे डाल कर.
जो चूड़ी भी पहने तो,
मेरी बाहों में बाहें डाल के,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो मेरे ठन्डे चावल के थाली पे भी,
हौले-हौले पंखा बैठ के डुलाये,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


तुम्हारी चरणों में पिता,
मैं भी अभिनन्दन करता हूँ,
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर दिल से तुम्हारा बंदन करता हूँ.
ऐसी कोई सुबहा नहीं,
जब आँखों में आंसूं न आये,
ऐसी कोई रात नहीं,
जब दिल को तुम याद न आये.
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर हर एक छन मैं,
तुम्हारी चरणों में नमन करता हूँ.
तुम्हारी चरणों में पिता,
मैं भी अभिनन्दन करता हूँ,
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर दिल से तुम्हारा बंदन करता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ की ममता मिल जाए,
तो जीना है आसान।
जन्नत ले जा ए खुदा,
तू दौलत ए इंसान.
कुटिया में भी रह लूंगा,
मैं अपनी माँ के साथ.
सुखी रोटी में भी,
भर देती है जो स्वाद।
माँ के हाथ का भोजन मिल जाय,
तो जीना है आसान।
जन्नत ले जा ए खुदा,
तू दौलत ए इंसान.

परमीत सिंह धुरंधर

होली


एक होली मैंने खेली,
मेरी पिचकारी थी,
और थी उनकी चोली।
भींगती थी वो,
मुस्करा-मुस्कारा कर,
जब-जब हमने,
रंग थी उनपे डाली।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

कर्ण


हर पल में बेचैनी है जिसके,
हर नींद में एक ही चाह,
एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर राह.
ना माँ की दुआएं हैं, न प्रियेसी की प्रीत,
न किसी से आशा है, न किसी का आशीष,
बस एक बार सामना तो हो जिंदगी,
मैं रोक दूंगा अर्जुन की हर जीत.

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

सैनिक का प्रेम


हिमालय की गोद में बैठा,
मैं पल-पल,
तुम्हे याद करता हूँ,
तुम्हे पाने की इतनी तमन्ना,
की सर्द हवाओं को,
अब अपना कहता हूँ.
तेरी जुल्फों की जंजीरे,
इतनी प्यारी हैं,
की मैं दुश्मन की गोलियों को,
सीने पे धारण करता हूँ।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

सौ बार लड़ूंगा हल्दीघाटी में


राते जितनी काली हो,
नशा उतना ही आता है मुझे,
दर्द जितना गहरा हो,
जीने में उतना ही मज़ा है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
दिल्ली की रौनक मुबारक हो तुम्हे,
मेवाड़ की शान भाती है मुझे।
मैं राजपूत हूँ, कोई मुग़ल नहीं,
योवन की हर धारा तेरे लिए है,
माँ की गोद लुभाती है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’