ज्ञान वो ही, विज्ञान वो ही,
जिसमे ना अभिमान हो.
और बिक जाए जो बाजार में,
उसका फिर क्या सम्मान हो.
रक्त वो ही, वक्त वो ही,
जो अपने साथ हो,
जो खड़ा हो दुश्मनो,
की भीड़ में,
उससे फिर क्या लगाव हो.
परमीत सिंह धुरंधर
ज्ञान वो ही, विज्ञान वो ही,
जिसमे ना अभिमान हो.
और बिक जाए जो बाजार में,
उसका फिर क्या सम्मान हो.
रक्त वो ही, वक्त वो ही,
जो अपने साथ हो,
जो खड़ा हो दुश्मनो,
की भीड़ में,
उससे फिर क्या लगाव हो.
परमीत सिंह धुरंधर
जमाने की ये भीड़ सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
छोड़ के अइनी हम माई के अंगना,
की बाँध के रखे तोहके अपना आंचरा।
की घरवा के ई खटपट सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
की देहिया दुखाये ल, रात-दिन करके,
एगो तू रहतअ तअ ना कहती ई बढ़के।
पर सब केहूँ के कचर-कचर सैया, ना भाये हमके।
चलअ बनावअ कुटिया, हिमालय में चलके।
परमीत सिंह धुरंधर
वो क्या था,
मेरा ख़्वाब,
या कोई हकीकत।
मेरी खुली आँखों,
का सच,
या फिर,
बंद पलकों का,
कोई कमाल।
मैं आज तक नहीं,
जान पाया।
ऐसी बारिश जो,
फिर दुबारा न हुई।
वो मुलाकात,
जिसमे पल तो गुजरे,
साथ, पर मैं,
पहचान न सका.
एक क्षण को वो,
सामने थी, जैसे
सुबह की उषा.
जैसे, बादलों के
योवन को चीरती,
मीठी धूप.
जैसे पलके खुलने,
से पहले, आँखों में
पला मीठा सपना।
आज भी भागता हूँ,
आज भी रोता हूँ,
आज भी ढूंढता हूँ।
सोचता हूँ की,
कहीं तो मिलेंगी,
कभी तो दिखेंगी।
इस बार वैसी,
गलती नहीं।
पर मन भयभीत है,
कैसे पहचानूँगा।
बस देखा ही तो था,
वो भी एक क्षण को।
लेकिन बरसो का सुख,
दे कर, वो छुप गयी,
पूर्णिमा की चाँद सी।
सुबह की ओस सी।
कहीं बदल न,
गयीं हों।
कहीं घूँघट न,
रखती हो अब।
हर पल डरता है,
मेरा दिल,
हर पल भयभीत है,
मेरा दिल।
ये सोच कर की,
कहीं अब घर से ही,
ना निकलती हो.
पर मैं तो घर भी नहीं,
जानता उनका।
ना ही जानता हूँ,
पता उनका।
ना कोई फोटो ही है,
ना कोई जानकारी।
पर एक कोसिस है,
आज भी मेरी लड़ाई है,
अपनी किस्मत से।
शायद मिल जाए,
कभी दिखा जाएँ,
इन राहों में,
दिन में या रातों में,
दिल्ली में या पुणे में।
आज भी ढूंढ़ रहा हूँ.
तो दोस्तों,
उन्हें घरो से निकलने से,
मत रोको।
उन्हें घूँघट या पर्दा करने,
को मत कहो.
तो दोस्तों, उनपे हमला,
मत करो,
उनको जख्म मत दो।
जब तक वो मुझे,
मिल नहीं जाती।
उनका बलात्कार,
मत करो।
की मैं,
अभी तक अपनी,
महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ।
परमीत सिंह धुरंधर
पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.
परमीत सिंह धुरंधर
माँ है,
माँ है,
माँ है, दोस्तों,
धर्म से, ज्ञान से,
वेद से, पुराण से,
सबसे महान दोस्तों।
विधि से, विधान से,
मानव के कल्याण से,
माँ,
सबसे महान दोस्तों।
परमीत सिंह धुरंधर
एक छोटी सी झोपडी में,
चूल्हे को जलाकर,
माँ ने सेंकी है रोटी,
अपने हाथों को जलाकर.
तीन दिनों से भूखी माँ,
पानी की बूंदो पे,
मुस्काती, खिलाती,
लाल को अपने,
अपना पेट जला कर.
मैली-कुचली साड़ी में,
पैबंद को लगाकर,
खुश है मेले में माँ,
बच्चे को खिलौने दिलाकर.
एक छोटी सी झोपडी में,
गिल्ली मिटटी पे लेटी माँ,
जागती है रातभर, गीत गाती,
अपने बच्चों को बिस्तर पे,
मिट्ठी नींद में सुलाकर.
परमीत सिंह धुरंधर
This poem is about Mastani (http://en.wikipedia.org/wiki/Mastani), who was the wife of Peshwa Baji Rao I (http://en.wikipedia.org/wiki/Baji_Rao_I).
मस्तानी की आँखे,
ह्रदय से बोलतीं थीं,
बाजीराव की बाहों में,
जब वो अमृत घोलती थीं.
मुख पे चन्द्र की आभा,
वक्षों पे सागर लिए थी.
नयन-कटार में,
छत्रशाल सी निपुण,
अपने योवन में,
सिंधु सी बलवती थी.
खिलने लगे पुष्प उधान में,
कोयल चहकने लगी थी.
रण में मिले जख्मों को,
वो चाँद बनके हरने लगी थी.
पुलकित मस्तानी जब,
खिलने लगी कवल सा,
बाजीराव के पौरष को,
एक नया अभिमान मिला.
जिस शमशीर ने गढ़ा,
भारत का नया मानचित्र,
उसकी चमक का सौभाग्य खिला.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी एक दुकान है, जहाँ कुछ भी मेरा नहीं.
सूर्य कहते हैं,
प्रखर बनो.
हवा कहती है,
बहते रहो.
नदिया कहती है,
जोश से जियो.
और किनारें कहते हैं,
प्रेम में टूट चलो.
वृक्ष कहते हैं,
सदा ऊपर उठो.
कलियाँ कहती है,
खिलते रहो.
फूल कहते हैं,
समाज को,
सुगन्धित करो.
और भौरें कहते हैं,
विचरते रहो.
लहरें कहती हैं,
उछल कर वार करो.
चाँद कहता है,
शीतल बनो.
अग्नि कहती है,
खुद पहले जलो.
और बादल कहते हैं,
बरसने में ना,
भेद करो.
रात कहती है,
दीपक बनो.
दिया कहता है,
पथ प्रदर्शित करो.
पत्थर कहते हैं,
स्थिर रहो.
और राहें कहती है,
मंजिल की तरफ,
बढ़ते रहो.
उषा कहती है,
श्रम करो.
साँझ कहती है,
मनन करो.
फल कहते हैं,
मिठाश बांटों.
और काटें कहते हैं,
स्वीकार करो.
दर्पण कहता है,
सत्य समझों।
जीवन कहता है,
समय का मान करो.
समय कहता है,
त्याग करो.
और मोह कहता है,
बलिदान करो.
परमीत सिंह धुरंधर
नगरिया चलल बा ये भोला,
डगरिया उठल बा ये भोला,
तहरे ही धाम अब ई रुकी,
भक्तन के टोला ये बाबा.
केहू के तन्वा में पीड़ा उठल बा,
केहू के मनवा में आंधी मचल बा,
सबके दिल के आस बा ,
तहरे दुअरिया पे बाबा .
अन्ख्वा के लोर त सुख गईल बा,
मनवा त अभी बैचेन बा,
कब तक आँचल ई एसे रही, सुखल आ खाली ये बाबा,
भर दिहिन अब त भक्तन के झोला ये बाबा.
आ व ना मान जा अब, पूरा कर अ परमित के कामना,
ताहरा से बढ़ के कें बाटे ये संसारिया में बाबा.
कभी-कभी त उठेला मनवा में हाम्रो आस हाँ,
तहरे से जुरल बा भक्तन के सारा ख्वाब हाँ,
अब त सुन के पुकार आँखवा त खोलीं ये बाबा,
ल देख अ आइल्बानी तहरे वोसरिया ये बाबा.
डगरिया भरल बा ये भोला,
नजरिया लागल बा ये भोला.
नगरिया……………..ये बाबा.
परमीत सिंह धुरंधर