बैलों और भैंस में येही अंतर है कि भैंस घांस खुद चर लेती है और बैल को काट के, खल्ली मिला के खिलाना होता है, परमीत.
Author: hotcrassa
कुछ बैल सिर्फ म…
कुछ बैल सिर्फ मेलों में सजते है और वो बस नाद पे ही भातें हैं, और घर में दहेज़ लाने का काम करते है. वो कभी ना तो खेत में ही सज पाते है न ही खलिहान में. अब ये तो आप कि जावानी पे है कि आप कैसा बैल खरीदते हो, परमीत.
सर्वश्रेष्ठ-रिश्ते
मेरे बैलों कि जोड़ी बड़ी अनमोल है,
एक सीधा तो एक मुहजोड़ है.
बहते है दिन भर पछुआ में,
अरे ये तो बड़े बेजोड़ है.
देख के हल मेरे काँधे पे,
उछलने लगते है ये नाद पे.
अपने सींगों,
पे उखाड़ दे पहाड़ को,
ताकत में ये बेमिशाल हैं.
बहते हैं खेत में झूम -झूम के,
लौटते है घर को,
मिटटी उछाल-उछाल के,
मेरी जवानी के,
ये रिश्ते सर्वश्रेष्ठ हैं परमीत
गड़ासा प्यार में
लिए गड़ासा चल पड़ा हूँ प्यार में,
आज काट के लाऊंगा पूरी घांस रे,
फिर खाना मस्ती में मेरे बैलों,
लगाऊंगा हरियाली जब तुम्हारे नाद में.
इस गावं में या उस गावं में,
चाहे गुमेजी से या चंवर से,
पर लाऊंगा परमीत आज घांस मेरे बैलों,
फिर खाना मुँह डूबा के नाद में
साजन
कब तक मैं देखूं दर्पण को,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे पराया बना दें.
तू जो देती है यूँ रोज-रोज,
नयी-नयी मुझे चूड़ियाँ,
वो भी पूछती है रातों को,
कब बजेगी मेरी शहनाइयां.
कब तक मैं सोऊँ यूँ किवाड़ भिड़ा के,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे डोली में बिठा दें.
भाभी छेड़ती है,
घींच के चुनार मेरी,
सखिया पूछती है चिठ्ठी में,
कब मैं पता बदलूंगी.
कब तक मैं निकलूं, काजल लगा के,
ए माँ कह दे बाबुल से,
अब मुझे परमीत सा साजन दिला दें.
अभिमन्यु
काश तुम होते हमारे साथ पिता जी,
तो हम यूँ अकेले न होते।
इस मोड़ पे जिंदगी के,
यूँ तन्हा-तन्हा न होते।
अभिमन्यु बढ़ा है,
तुम्हारी शान में,
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल इस मैदान में,
जग करता रहेगा,
तुम्हारा गुणगान पिता जी,
काश तुम होते हमारे साथ पिता जी।
गुलाब और परमीत
आज तो मेरे १४ साल के दोस्त गुलाब ने भी दोस्ती तोड़ दी. मैंने सोचा क्यों ना विदेशी धरती पर विदेशी कन्या को प्रेम-निवेदन किया जाय. आज तक मैंने जितने भी प्रेम-निवेदन कियें, उनमे मेरे दोस्त ने हमेशा साथ दिया चाहे जितनी भी जिल्लत हुई हो, लेकिन आज उसने साफ़ इनकार कर दिया. आखिर कब तक वो मेरा साथ दे या अब उसे मेरे दोस्ती में वैसा मज़ा नहीं मिलता. जैसे ही मै आज उससे मिला और अपना मकसद बोला पाहिले तो उसने मुझे हतोसाहित किया, फिर बात ना बनता देख बोला की अब उसमे धीरज नहीं की, वो और जिल्लत नहीं सहेगा. अरे भाई मेरे हाथ में आने पे उसकी किस्मत क्या हो जाती है. पैरों के नीछे कुचलना तो दूर कोई उसे छूता भी नहीं. उसने आखिर में एक सवाल पूछा की क्या अब तक किसी ने मेरे हाथ से उसे ग्रहण किया है. और उसने मुझे कहा की वो अब मेरा साथ नहीं दे सकता. मेरे साथ रहने पर उसका अर्थ, उसका प्रेम-प्रसंगता नष्ट हो जाती है. मैंने भी आज अपने दोस्त को अलविदा कह दिया. उसने सोचा की अब शायद मै कुछ नहीं करूँगा. उसने मुझसे कहा की बुरा नहीं मानना , ये तेरे भलाई के लिए कर रहा हूँ. मैंने कहा दोस्त मै आज बोलू भी तो कोई फायदा नहीं. परमित सिंह तो तुम्हारे बिना भी प्रेम-निवेदन कर सकते है, ये तो तुम थे जिसने कहा था १४ साल पहिले, की आज कल कोई प्रेम समझता नही, मनुष्य अब प्रेम के महत्व को समझता ही नहीं. जब लोगो ने तुम्हे छोड़ दिया था तब मैंने तुम्हारी महानता को दर्शाया. मेरी आवाज ही काफी है मेरे लिए. मै चल निकला अपनी राह. गुलाब ने भी वैसे ही हंसी बिखेरी जैसे आज तक उन सभी ने जो मेरी मदद लेने के बाद मुझे वेव्कुफ़ कह कर मुझ पर हँसते है. अपनी दबी हुई हंसी में उसने कहा, नहीं बदलेगा साला परमीत सिंह, मैंने सुना दर्द हुआ, लेकिन फिर सोचा हर किसी की चाहत ये ही है की मै बदल जाऊं और तब जब वो धोखा दे कार्य समझाने की कोशिस करते है की उन्होंने धोखा नहीं दिया. मै दो पल रुका और पलट कर बोला की बदलना उनकी आदत है जिनकी सुन्दरता गुलाब पर निर्भर होती है…………..परमीत
होली : मायका और ससुरा में
सोलहगो होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में.
पाहिले त आँखवा में आंसू आइल,
न अब माई-बहिनी भेटाई रे,
पर रोम-रोम पुलकित हो गइल,
जब नंदी मरलख पिचकारी से.
पिचकारी से.
गावं-गावं होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में.
दोपहर भइल फिर साँझ भइल,
सुने न कोई हमर गारी रे,
अरे चूड़ी टुटल, कंगन टुटल,
जब धइलख देवर अँकवारी में.
नाच-नाच होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में, परमीत
मानसिकता
कबूतरों के राज्य में राजा कबूतर ने नए उतराधिकारी को चुनने के लिए बुद्धिमान कबूतरों की सभा में चर्चा की. उनके राज्य में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं था. सभी सामान थे, लेकिन राजा बन ने के लिए एक शर्त थी की उतराधिकारी कभी झूठ ना बोले. यहाँ तक की राजा बन ने के बाद भी. कठिनाई ये थी की दोनों उमीदवारों ने कभी झूठ बोला ही नहीं, तो राज्य किसको दिया जाये? नए कबूतर राजकुमारी को चाहते थे, उन सबने उनके लिए मत दिया. बहुमत ना बन पाने की दृष्टि में राजा ने गुरु से परामर्श किया. गुरु मुस्कराय और राज्य राजकुमार को दे दिया. प्रश्न ये उठता है की क्या राजगुरु सही थे या उन्होंने गलत किया पुरुष प्रधानता की मानसिकता के तहत बंध कर……परमीत
होली
कबूतरों की भीड़ में एक नर कबूतर बोला होली आई -होली आई,