परमित और होली…


कौन कहता ही की होली रंगों का खेल है,

हमने तो इसे हाथो से खेला है परमित.

जवानी के दांव


जब से जवान भइल बारू,
गुलशन के आम भइल बारू।
ललचअ तारन केजरीवाल भी,
आ बुढऊ अन्ना के,
जी के जंजाल भइल बारू।
शीला के कईलु तू पानी-पानी,
ये ही उम्र में ममता के,
जी के घाव भइल बारू।
मोदी भी बारन धोती खोंट के,
बाबा राहुल के,
जवानी के दांव भइल बारू।

होली और सौतन


जब निकलती हूँ मै डाल के,
घूँघट अपने मुखड़े पे,
तो छुप जाता है सूरज,
जाने-जाके किन गलियों में.
जब चलती हूँ उठा के,
घूँघट मैं अपने मुखड़े से ,
तो चाँद भी बहक जाता है,
मेरे यौवन के रस से.
कैसी जवानी,
रब्बा तुने है दी मेरे तन पे,
हर गली में एक आशिक हैं मेरा,
हर घर में है एक सौतन रे.
कैसे छोड़ दूँ मैं,
साजन को अकेले होली में,
कितनो कि नजर मुझपे है,
और कितनो कि मेरे घर पे, परमीत

होलिका-दहन


रंगे-मोहब्बत चमक उठती है,
आज भी,
उनके एक नज़र मिलाने से,
दर्दे-जिगर को,
क्या समझाउं परमित,
जो आज भी बहल जाता है,
उनके सिर्फ मुस्कराने से.
वो खेल जाती हैं होली,
आज भी,
मेरी तमन्नावों से,
एक कसक सी उठती है,
जब फरेबे-मोहब्बत की,
जो उनके सिने में.
की जाने कब तक लुटता रहेगा,
यूँ ही मेरा आसियाना,
हर साल आ जातीं है वो,
होलिका-दहन मानाने,
मेरे ही आँगन में.

दर्दे-उल्फत


बहुत खुसनसीब हैं वो लोग,
जिनको कद्रदान मिलें,
हमें आज तक, जो भी मिले,
सिर्फ, अनजान ही मिलें.
की,
दर्दे-उल्फत अब क्या कहें तुमसे,
की,
कसीदे पढ़ें हमने जिनकी
तारीफें-मोहब्बत में,
उनको भाया वो,
जिससे मिलते हैं वो
चोरे-बाज़ार में.
उनको हमारा इश्क में,
अंदाजे-जिगर नहीं भाया,
वर्ना,
चोर-बाजारी तो हम भी करते हैं,
और, वो जिगर नहीं रखते,
उनके इश्क का परमित,
जिनका, अंदाजे-बयां वो,
अपने शर्मो -हया से करते हैं.

नया जाम


मेरी जिंदगी अब मुझे,
एक नया अंदाज दे,
कुछ नहीं तो दर्द को मेरे,
एक नया आसमां दे.
लौट सकता नहीं अब मैं,
उनके दामन में परमित,
कुछ नहीं तो मेरी ओठों को,
एक नया जाम दे, परमीत.

होली


ज़िन्दगी है,
सो गुज़र रही है,
वरना हमें गुजरे,
तो ज़माने हुए.
कोई मिल गया,
तो होली खेल लेंगे,
वरना किसी को रंग लगाये,
तो जमाने हुए, परमीत.

होली


सरहद पे हैं शातिर खड़े,
हम कब तक तुम्हे प्यार करें,
लूट जाएंगी ये सल्तनत मेरी,
अगर हम,
यूँ ही तेरी बाहों में रहे.
धीर बन के कर इंतज़ार मेरा,
फिर रंगूगा तुझे नए रंग से,
वैसे कमी नहीं संसार को मेरी,
तू चाहे तो, परमीत
खेल ले होली किसी और के संग में.

सैयां संग होली


ये पहली होली है,
मेरे सैयां जी के साथ में,
खूब चली है पिचकारी,
शिकागो-लखनऊ के संग्राम में, परमीत

मेनका और अरविन्द केजरीवाल: पार्ट I


स्वर्गलोक में सभी देवतावों के बीच देवराज इंद्रा का खामोश और झुका चेहरा देवगुरु बृह्श्पति कि चिंता का कारण है. तीन दिनों से नाचती उर्वशी थककर बेहोश हो चुकी है, मगर इंद्रा कि नजरों ने जाम के एक बूंद को भी ओठों से नहीं लगाया।
नारद मुनि का आगमन, देवतावों का उनको कौतहूलता के साथ देखना। नारद: प्रणाम देवगुरु।
देवगुरु: स्वागत है नारद।
नारद: क्या हुआ है देवगुरु, देवराज इस कदर किस सुंदरी के रस का पान कर रहे है.
देवगुरु: नारद, वो देवराज ही क्या जो सुंदरियों का स्वामी न हो. मगर चिंता ही ये है कि अब देवराज का सुंदरियों से मोहभंग हो गया है. उर्वशी, रम्भा और तो और अब वे देवी रति कि बाहों में भी अशांत रहते हैं. पिछले चार दिनों से तो वो किसी के पास गये भी नहीं।
नारद: इसमें इतनी चिंता का क्या विषय है, जब लालशा जागेगी तो चले जायेंगे।
देवगुरु: नारद, मनुष्यों कि तरह मत बात करो जो हर चीज़ ये सोच के रखते है कि कल उसका पान करेंगे। अंततः, उन सब चीज़ो का पान कोई और करता है. सब छोड़ दो, तो भी इन अप्सराओं का क्या करें। अब तो धरती पे कोई योग पुरुष या मुनि भी नहीं जो इनको भोग करें। धरती पे अब कोई बलवान रावण भी नहीं, जिनसे इनका अपहरण का स्वांग रचे. सामान्य मानुष अगर इनका भोग करेगा तो फिर इनका मोल ही क्या रहेगा।
नारद: मन में सोचते है कि देवगुरु पागला गये हैं मैंने कब कहा कि इन्हे धरती पे भेज दो.
देवगुरु: क्या सोच रहे हो नारद। अरे नारद, जब रात गहराती है और ये अप्सराएं कई-कई दिनों तक जब सज संवर के रातो को प्रेम रस का पान करने में असमर्थ रहती है,तो मेरे समर्थ आके मेरे ही चरित्र कि परीक्षा ले ने लगती है. लगता है नारद, इस कलियुग में आके कहीं मेरा गुरुपद न छीन जाएँ।
नारद: तो क्या बाकी देवों का इनके कौमार्य से मोह भंग हो गया है?
देवगुरु: तुम भी नारद, ये क्या बातें कर रहे हो. अरे, स्त्री ही वो आनंद है, जिसे अँधा बिना देखे ही देखता है और लूला बिना छुए भी उसके स्पर्श का सही और सच्चा पान कर सकता है.
नारद: देवगुरु, सीधे -सीधे कहिये।
देवगुरु: नारद। सत्ता और शासक के लिए ही स्त्री का उद्भव हुआ है, और स्त्री भी शासक द्वारा शासित हो कर ही सुख को धारण करती है. कोई भी अप्सरा ज्यादा दिनों तक इंद्रा कि बाहों से दूर नहीं रह सकती। अरे इन लोगो ने अन्य देवों को अपने शयनकक्ष में आने से मना कर दिया है.
नारद: तो क्या इंद्रा ने अपने प्रिये मेनका का भी त्याग कर दिया है?
देवगुरु: नहीं नारद। लेकिन ये ही तो चिंता का विषय है. मेनका यहाँ सवर्गलोक में नहीं है. वो धरती पे विचरण करने गयी है.
नारद: तो बुला लिजिये…, हँसते हुए…..
देवगुरु: ये इतना आसान होता तो हम कर चुके होते। वो आज कल एक पुरुष के जीवन को जी रही है. और उसको यहाँ तब तक नहीं ला सकते जब तक विधि का विधान न हो.
नारद: पुरुष के जीवन को ! ये क्यों और कौन है वो पुरुष?
देवगुरु: ये सब श्राप के चलते हो रहा है, मेनका शापित हो के सब भूल चुकी है और इस जीवन में धरती पे श्री अरविन्द केजरीवाल का जीवन जी रही है.
ये सुनकर नारद गायब हो जातें है, वो धरती पे मेनका रूपी अरविन्द केजरीवाल के दर्शन को चले जाते हैं. उन्हें इस बात का पता ही नहीं चला कि कब मेनका शापित हो कर केजरीवाल के रूप में धरती पे अपनी लीला करने चली गयी.