वो अलग लोग थे जो भेजते थे बादलो से पैगाम
ये हम हैं जो हरे पत्ते पे लिख देते हैं तेरा नाम
तू जब जुल्फों को बांधे इनके फूलों से तो ये गुनगुना दें
तेरे कानों में धीरे से कैसे गुजरती है तेरे बिना मेरी शाम.
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वो अलग लोग थे जो भेजते थे बादलो से पैगाम
ये हम हैं जो हरे पत्ते पे लिख देते हैं तेरा नाम
तू जब जुल्फों को बांधे इनके फूलों से तो ये गुनगुना दें
तेरे कानों में धीरे से कैसे गुजरती है तेरे बिना मेरी शाम.
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तेरी शर्म तुझपे ही नहीं मुझपे भी भारी है
हो जाने दे कोई गुनाह, इस मोड़ पे वो जरुरी है.
तू कल खंजर भी उतार दे तो कोई गम ना होगा
आज किओ रात बस तेरी ही जी हुजूरी है.
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हुस्न जब भी मिला उनका एक नशा सा छा गया
बेवफा ही सही वो, मगर मजा तो दे गया.
अधरों को अधरों पे टिका कर, वो बहुत कुछ सीखा गया
वक्षों तक आते-आते, वो खंजर भी उतार गया.
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मोहब्बत में किसी को कुछ भी हासिल नहीं है.
इस समंदर का कोई साहिल नहीं है।
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वो मिली और बैठी इतने करीब में
तन्हाई लिख गयी ताउम्र मेरे नसीब में.
दरिया कब हुई है किसी किनारे की?
मगर डूबते हैं वो इसी यकीं में.
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अब बारिशों का मौसम वैसा न रहा
रूह, रूह न रही, दिल, दिल न रहा.
सुखाता नहीं हूँ जिस्म को अब भींगने के बाद
दुप्पटे पे उनके मेरा हक़, अब वो हक़ न रहा.
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तेरा मुस्कराना, अब वो मुस्कराना न रहा
तेरा दीवाना, अब वो दीवाना न रहा.
तूने रचाई मेहँदी ऐसे किसी के नाम की
बनारस बसने का मेरा इरादा, इरादा न रहा.
हसरतों को ऐसे दफना गयी वो मेरे
फाइलों को चूमने का कोई बहाना न रहा.
उन्हें ही देख के सजाता था वीरान ठिकाने को
उन्हें देखने का वो अब अपना ठिकाना न रहा.
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दुनिया मेरी, सिक्के मेरे, कुछ भी मेरा न चला
वो कभी फिर ना मिली, कुछ भी फिर न मिला।
तड़पता रहा उम्र भर मैं, दर्द ही ऐसा लिया
दवा कोई, दुआ कोई, कुछ भी असर ना मिला।
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हुस्न ढला, तो वो घर बसा गयी
दिल टुटा तो मुझे अक्ल आ गयी.
ना रहा भेद जरा भी ख़ुशी और गम में
जिंदगी ऐसे-ऐसे रंग दिखा गयी.
दोस्त कह कर वो ले गए महफ़िल में
वहाँ उनको दुश्मनी याद आ गयी.
वो मिली तो मुझे जान, जानू, दुनिया बना गयी.
सब बना के, शौहर किसी और को बना गयी.
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गरीबी और आशिकी ने वो मंजर दिखा दिया
जन्नत सी दुनिया में जहन्नुम दिखा दिया।
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