बाज़ार-ए-इश्क़


क्यों रुका है दिल किसी के इंतज़ार में,
कब सजी हैं राहें-ए-मोहब्बत किसी की बाँह में।

जो कहते हैं आशिक़ों को बस जिस्म की चाह है,
वो बदल रही है जिस्म, एक किस की चाह में।

क्यों मिटा रहा है दिल किसी के इंतज़ार में,
जब हुस्न ढूँढ़ रहा है प्रेम, जिस्म के बाज़ार में।

मैं चाँद को देखने की भी तमन्ना नहीं रखता,
उड़ान से पहले मैं आसमान को नहीं देखता।

क्यों न यहाँ फिर जिस्म का बाज़ार सजे,
वो भी तो उतर आई हैं, पर्स में सारी दौलत लिए।

मैं बस रील्स में ही ख़ुद को बिहारी नहीं कहता,
मैं ज़िंदा हूँ तो एक ये ही अहंकार लिए।

RSD

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