मोहब्बत यहाँ पे, ना किसी की हुई है
ना कोई मोहब्बत में बसा ही कहीं हैं.
लगा लो हाँ दिल को घडी -दो -घडी बस
उम्र भर यहाँ तो ना कोई किसी का.
Rifle Singh Dhurandhar
मोहब्बत यहाँ पे, ना किसी की हुई है
ना कोई मोहब्बत में बसा ही कहीं हैं.
लगा लो हाँ दिल को घडी -दो -घडी बस
उम्र भर यहाँ तो ना कोई किसी का.
Rifle Singh Dhurandhar
गमे-दर्द में तुम बहकने लगे हो
सफर जिंदगी का, तुम थकने लगे हो.
गमे-दर्द में तुम बहकने लगे हो
ये सफर जिंदगी का, तुम थकने लगे हो.
सूरज वही है, चंदा वही-२
एक तारे के टूटने से डरने लगे हो.
पर्वत तुम्हारे हैं, पहाड़े तुम्हारी-२
एक दरिया के बहाव पे तुम थमने लगे हो.
गमे-दर्द में तुम बहकने लगे हो
ये सफर जिंदगी का, तुम थकने लगे हो.
काँटों से भरी है यहाँ राहें सभी की-२
तुम खुद ही हाँ दामान चुराने लगे हो.
क्या पाना यहाँ और खोना यहाँ-२?
ये कैसे सवालों में खुद को उलझाने लगे हो?
गमे-दर्द में तुम बहकने लगे हो
ये सफर जिंदगी का, तुम थकने लगे हो.
Rifle Singh Dhurandhar
मुझसे ना पूछ
ए जमाना
मेरे महबूब का नाम.
मेरे अश्क
उसकी तस्वीर बना देंगें।
तुम्हे क्या पड़ी
मेरे दर्द की?
उसका रूप
तुम्हारे दिल में भी
दर्द जगा देंगें।
लौट गए इतने सावन
मेरे दर से
अब बहारें आके भी
क्या कर लेंगी?
जो वो अपना घूँघट उठा देंगें।
Rifle Singh Dhurandhar
ज़माने की भीड़ में इतना तन्हा हूँ पिता
की मेरी अंगुलियाँ भी एक -दूसरे को नहीं जानती।
Rifle Singh Dhurandhar
कवि लिख रहा है कविता, तेरे प्यार में वो बबिता।
तू सुनती नहीं तो, दिल जग को सुना रहा.
फिर ऐसा दर्द न, किसी प्रेम को मिले।
जैसा दर्द पा कर, दिल मेरा तड़प रहा.
जब – जब दिल हुआ घायल, मैंने खरीदे थे पायल
दिल सारे पायलों को आज तोड़ रहा.
फिर तन्हाई में कोई जिंदगी ऐसे ना गुजरे।
जैसे दिल ये मेरा तन्हाई में गुजर रहा.
Rifle Singh Dhurandhar
सूर्य सा भाल, कौन्तेय का रूप
फिर भी धरा पे ना बंधू ना कुटुंब।
अपना ही तेज है, अपना ही बल
फिर भी सभा में, पल-पल,
क्षण-क्षण, अपमान का घूंट।
वीर के धैर्य का ना कर रण में सामना
पूछते हैं सभी केवल उसका वंश-कुल.
किस्मत के सहारे कब -कहाँ?
हुआ है कोई पौरष हाँ उदित।
पर भाग्य का ऐसा भी होता है एक दंश
ह्रदय, शौर्य ठुकराकर
द्रौपदी चुनती है कुरुवंश का दीप.
Rifle Singh Dhurandhar
मेरी चिड़िया, चुग ले दाना
छोड़ आसमा, बना ठिकाना।
तेरा है कोई, इस जहाँ में
समझ ले तू भी ये अफ़साना।
प्यासी रातें, तड़पते दिन हैं
संसार यही है, आँगन-चहचहाना।
Rifle Singh Dhurandhar
जुल्फों का तुम्हारे जब घना होगा साया
कहाँ तुम्हे याद होगा पिता की ये काया?
आँखों में शर्म और मुख पे होगी जब चंद्र की छाया
कहाँ तुम्हे याद होगा पिता की ये काया?
दो ही पलों का, बस यह मोह -माया
कहाँ तुम्हे याद होगा पिता की ये काया?
Rifle Singh Dhurandhar
मैं पुकारता ही रहा
प्रेम में होकर भाव-विभोर।
छोटी-सी इस जिंदगी में
कितनी कमजोर हैं प्रेम की डोर.
तपते रेत पे बारिश की दो-चार ही बूंदे
छोटी-सी इस जिंदगी में
कितनी कमजोर हैं किस्मत की डोर.
Rifle Singh Dhurandhar
जो सर्वविदित सत्य है
उसी से सबको इंकार है.
जिसका प्रेम जितना पवित्र है
वो उतना ही लाचार है.
अश्कों में बंधकर भी
जिसका ह्रदय बिशाल है.
फटी-मैली-कुचैली साड़ी में
भी माँ सागर सी अथाह है.
जितना मथ लो, गरल की एक बून्द नहीं
बस प्रेम-ही-प्रेम, आपार है.
मगर मनुष्य को कहाँ
इसका ज्ञान है?
भागता-भागता ही रहा जो
चैन-सुकून की तालाश में
फिर लौटा है, महलों को छोड़कर
टूटी-फूटी-टपकती झोपडी में
जो उसके माँ का निवास है.
Rifle Singh Dhurandhar