ना स्वर्ग माँगता हूँ, ना मोक्ष माँगता हूँ
भोलेनाथ तुम हो हमारे, बस भाँग माँगता हूँ.
सोया नहीं कई रात से मैं
तेरे दर्शन का अभिलाषी, तेरा नाम जपता हूँ.
Rifle Singh Dhurandhar
ना स्वर्ग माँगता हूँ, ना मोक्ष माँगता हूँ
भोलेनाथ तुम हो हमारे, बस भाँग माँगता हूँ.
सोया नहीं कई रात से मैं
तेरे दर्शन का अभिलाषी, तेरा नाम जपता हूँ.
Rifle Singh Dhurandhar
पुराणों में लिखा एक नाम है
बस मेरे भोलेनाथ का.
जिसे भय ना मायाजाल का
वो भक्त है महाकाल का.
शिव मेरे हैं, शिव मेरे
शिव से मेरा नाता है.
मैं क्या सम्भालूं खुद को?
जब स्वयं शिव मेरा रखवाला है.
स्वयं विराजे है कैलाश पे जो
पर सब पे जिसका ध्यान हाँ.
जिसे भय ना मायाजाल का
वो भक्त है महाकाल का.
जो नित करे विषपान हाँ
वो भक्त है महाकाल का.
जिसे अमृत से प्यारा भाँग हाँ
वो भक्त है महाकाल का.
Rifle Singh Dhurandhar
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
चाहे छुप ल, या कतनो तेल मल ल
अंग – अंग पे ताहार आज दिहन निशानी।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
साल भर से चल अ तारु मटक-मटक के
हर अ तारु दिल सबके नयना के चटक से
तहरा नस – नस में आज भाँग घोलाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
चाहे कूद ल, चाहे फाँद ल
चुनर -चोली आज ताहार दुनो रंगाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
कमरिया पे अपना हिला व् तारुन छपरा
सुगवा फाँस अ तारु लहरा के जोबना
बीच छपरा में आज तहार जोबना रंगाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
Rifle Singh Dhurandhar
होली में आप रहती और मैं रंगता
जवानी का नशा बिना भाँग के ही चढ़ता।
भींगती तेरी चोली मेरे रंग से
और जोबन पे तेरे मेरा रंग चढ़ता।
Rifle Singh Dhurandhar
मैं तो परिंदा बेबस जिंदगी में
क्या सुबहा, क्या शाम मेरी?
उड़ता हूँ तो धरती छीन जाती
लौटता हूँ तो आसमा, कहाँ मेरी।
Rifle Singh Dhurandhar
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
कई जुल्म की आँधिया गुजरी हैं इन राहों से-२
पर हार बार जख्म तेरे
पर हार बार जख्म मैं तेरे नैंनो से खाता हूँ.
और क्या मिटा दूँ दिल से यादे ए जमाना?
मैं क्या मिटा दूँ दिल से यादे ए जमाना?
मैं खुद को मिटाने की ही
मैं खुद को मिटाने की ही हर बार चल रखता हूँ.
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
Rifle Singh Dhurandhar
धोबन ताहर जोबन उछाल मारअता
दरिया के पानी में ताप मारअता।
लुटातारु जवार के मंद – मंद मुस्का के
दुगो नैन तहार सबके करेजा काटअता।
कब तक करबू इंतिजार प्यार के
सुगवा हमार, ताहार राह देखअता।
Rifle Singh Dhurandhar
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन चुनर आ चोली पारा-पारी।
दउरा तारी आँगन से देख अ हाँ दुआरी
रह गइल कोठी के खुलल हाँ किवाड़ी।
बाबू साहेब लेके हाँ छपरा के पिचकारी
रंग अ तारन चुनर आ चोली पारा-पारी।
अरे भागल बारी खेता – खेती, जाके हाँ गाछी
बच्चा पूछ अ तारन सन कहाँ गइली माई?
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन चुनर आ चोली पारा-पारी।
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन साली आ सरहज पारा -पारी।
इ कहस जीजा जी, अब त रहे दी
उ कहस, पाहुन ऐसे ना भीतर डाली।
बाबू साहेब लेके हाँ छपरा के पिचकारी
रंग अ तारन चुनर आ चोली पारा-पारी।
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन मोटकी आ पतरकी पारा-पारी।
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन साया आ साड़ी पारा-पारी।
बाबू साहेब छपरा के, लेके पिचकारी
रंग अ तारन नयकी आ पुरनकी पारा-पारी।
Rifle Singh Dhurandhar
भीषण युद्ध होगा
आरम्भ और अंत मेरे हाथ नहीं
परिणाम का मुझे ज्ञान नहीं
पर क्षण-क्षण में प्रलय का आभास होगा।
भीषण युद्ध होगा
भीषण युद्ध होगा।
सूर्य की तपिस और चंद्र की शीतलता
से ज्यादा, इस धरती का मेरी तीरों से श्रृंगार होगा।
जीत उनकी भले निश्चित हो गयी है आपके साथ से
मगर मेरे जीते-जी, पल-पल में उन्हें हार का भय होगा।
भीषण युद्ध होगा
भीषण युद्ध होगा।
साँसों का क्या है?
अभिन्दन में बीते, या वंदन में बीते
पौरष वही है जिसकी साँसे ना भय में बीते।
सुबह या शाम चाहे जैसी हो, मेरी तीरों का लक्ष्य बस एक होगा।
भीषण युद्ध होगा
भीषण युद्ध होगा।
Rifle Singh Dhurandhar
मुझे इश्क़ में दर्द मिला
मुझे दर्द में इश्क़ मिला
मैं तन्हा रहा जिसकी चाह में
वो मुझे अंत में तन्हा मिला।
वो सुहागन, पत्नी, माँ, बहु, सास
ऐसे भी बनती, वैसे भी बन गयी.
उसे सिंदूर, साड़ी, पायल, कंगन
ऐसे भी मिलते, वैसे भी मिल गयी.
मेरे हालात कैसे भी हों?
उसे तब पैसों की चाह
और अब मोहब्बत की
प्यास रह गयी.
Rifle Singh Dhurandhar