अब जीने का मन नहीं


अकेला हूँ, थका हूँ,
शिकायत करूँ, तो कहाँ,
हर तरफ से ,
ठुकराया हुआ हूँ।
तमन्नाएँ इतनी पाल ली,
की उनके बोझ से दबा हूँ। 
ख़्वाब इतने देखे,
की उनके टूटने से, जख्मी हूँ। 
चाँद ऐसा मिला, सफर में,
की उसके छुपने से,
अंधेरों में बैठा हूँ। 
जमाने से इतनी दुश्मनी,
की हर राह में अकेला हूँ। 
जवानी की मस्ती में इतना दौड़ा,
की पावों में अब दम नहीं।
इतना उड़ा आसमा की चाहत में,
की साँसों में दम नहीं।
कमबख्त ये दिल मेरा,
उनकी मोहब्बत में इतना डूब गया,
की अब,
किनारों तक पहुचने का दम नहीं।
की अब जीने का मन नहीं,
की अब जीने का मन नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर 

मीत बनके


बाग़ में गयी थी कल सखी मैं फूल तोड़ने,
कोई पावों को चुम गया मेरे शूल बनके।
छत पे गयी थी कल सखी मैं गेहूं छांटने,
आँखों में बस गया कोई मेरे धूल बनके।
पनघट पे गयी थी कल सखी मैं पानी भरने,
जोवन को चख गया कोई मेरे जल बनके।
कैसे कहूँ घर में ये सारी बातें, की
ह्रदय में रहने लगा है कोई मेरे मीत बनके।

परमीत सिंह धुरंधर 

जिंदगी


दौलत की जितनी है,
मुझे चाहत,
उतनी दौलत कहाँ,
मिलती है.
माँगा है जिसे,
मोहब्बत में,
वो अब कहाँ,
दिखती है.
अरे प्यारों,
ये ही तो है जिंदगी,
ये कब हमारी मुठ्ठी में,
बंद रहती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर 

संसार


तुझको प्यार ही नहीं,
मैं संसार कहता हूँ,
तू मेरी चाहत है,
ये खुले आम कहता हूँ.
ये जान कर भी,
की तू मेरी नहीं है,
तेरे तिब्बत पे मैं,
अपना अधिकार कहता हूँ.
माना की कभी तू बाहों,
में नहीं आएगी मेरे,
पर मैं आज भी तेरे,
क्रीमिया पे निगाहें रखता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ और भगत सिंह


तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।

परमीत सिंह धुरंधर 

परिन्दें


परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

आँख-मिचौली


इश्क़ इस कदर नाकामियों में पल रहा है,
की मैं मौत से मोहब्बत मांग रहा हूँ.
वो भी खेलने लगी है अब आँख-मिचौली,
जिससे मैं अपना दिल लगा रहा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

इल्तिजा


इतना भी मत लूटो,
की जीवन ही न रहे,
कुछ तो साँसे रहने दो,
दफनाने से पहले।
बड़ी शिद्दत से तुम्हे चाहा था,
बड़ी शिद्दत से तुमने लूटा है,
कुछ तो मुद्दत दे दो,
ताकि ये आसूं कब्र में न निकले।

परमीत सिंह धुरंधर 

जलता दीपक


मेरी सारी दौलत ले कर,
वो सोहरत मुझे लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मेरे कानों में,
की ये जलता दिया बुझा दो,
वो जलता दीपक बुझा दो.
मेरी सारी खुशियां ले कर,
वो ग़मों की राते लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मुझसे,
की वो खुली किवाड़ भिड़ा दो,
वो खुली किवाड़ भिड़ा दो.

परमीत सिंह धुरंधर 

एक आशिक़ की इल्तिजा जमाने से: अभी तक अपनी महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ…….


वो क्या था,
मेरा ख़्वाब,
या कोई हकीकत।
मेरी खुली आँखों,
का सच,
या फिर,
बंद पलकों का,
कोई कमाल।
मैं आज तक नहीं,
जान पाया।
ऐसी बारिश जो,
फिर दुबारा न हुई।
वो मुलाकात,
जिसमे पल तो गुजरे,
साथ, पर मैं,
पहचान न सका.
एक क्षण को वो,
सामने थी, जैसे
सुबह की उषा.
जैसे, बादलों के
योवन को चीरती,
मीठी धूप.
जैसे पलके खुलने,
से पहले, आँखों में
पला मीठा सपना।
आज भी भागता हूँ,
आज भी रोता हूँ,
आज भी ढूंढता हूँ।
सोचता हूँ की,
कहीं तो मिलेंगी,
कभी तो दिखेंगी।
इस बार वैसी,
गलती नहीं।
पर मन भयभीत है,
कैसे पहचानूँगा।
बस देखा ही तो था,
वो भी एक क्षण को।
लेकिन बरसो का सुख,
दे कर, वो छुप गयी,
पूर्णिमा की चाँद सी।
सुबह की ओस सी।
कहीं बदल न,
गयीं हों।
कहीं घूँघट न,
रखती हो अब।
हर पल डरता है,
मेरा दिल,
हर पल भयभीत है,
मेरा दिल।
ये सोच कर की,
कहीं अब घर से ही,
ना निकलती हो.
पर मैं तो घर भी नहीं,
जानता उनका।
ना ही जानता हूँ,
पता उनका।
ना कोई फोटो ही है,
ना कोई जानकारी।
पर एक कोसिस है,
आज भी मेरी लड़ाई है,
अपनी किस्मत से।
शायद मिल जाए,
कभी दिखा जाएँ,
इन राहों में,
दिन में या रातों में,
दिल्ली में या पुणे में।
आज भी ढूंढ़ रहा हूँ.
तो दोस्तों,
उन्हें घरो से निकलने से,
मत रोको।
उन्हें घूँघट या पर्दा करने,
को मत कहो.
तो दोस्तों, उनपे हमला,
मत करो,
उनको जख्म मत दो।
जब तक वो मुझे,
मिल नहीं जाती।
उनका बलात्कार,
मत करो।
की मैं,
अभी तक अपनी,
महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ।

परमीत सिंह धुरंधर