पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ


माँ है,
माँ है,
माँ है, दोस्तों,
धर्म से, ज्ञान से,
वेद से, पुराण से,
सबसे महान दोस्तों।
विधि से, विधान से,
मानव के कल्याण से,
माँ,
सबसे महान दोस्तों।

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ


एक छोटी सी झोपडी में,
चूल्हे को जलाकर,
माँ ने सेंकी है रोटी,
अपने हाथों को जलाकर.
तीन दिनों से भूखी माँ,
पानी की बूंदो पे,
मुस्काती, खिलाती,
लाल को अपने,
अपना पेट जला कर.
मैली-कुचली साड़ी में,
पैबंद को लगाकर,
खुश है मेले में माँ,
बच्चे को खिलौने दिलाकर.
एक छोटी सी झोपडी में,
गिल्ली मिटटी पे लेटी माँ,
जागती है रातभर, गीत गाती,
अपने बच्चों को बिस्तर पे,
मिट्ठी नींद में सुलाकर.

परमीत सिंह धुरंधर 

दुल्हन


जो दर्पण को देख कर शर्मा जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो झुकी पलकों से भी दिल को छू जाए,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जब लौटूं मैं हल लिए काँधे पे,
दिनभर का थका हारा,
तो वो मंद – मंद मुस्करा कर,
अभिनन्दन करे दरवाजे पे,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो काजल भी लगाये आँखों में,
मेरी आँखों में आँखे डाल कर.
जो चूड़ी भी पहने तो,
मेरी बाहों में बाहें डाल के,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।
जो मेरे ठन्डे चावल के थाली पे भी,
हौले-हौले पंखा बैठ के डुलाये,
ए पिता ऐसी ही दुल्हन चाहिए।

परमीत सिंह धुरंधर

पिता


तुम्हारी चरणों में पिता,
मैं भी अभिनन्दन करता हूँ,
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर दिल से तुम्हारा बंदन करता हूँ.
ऐसी कोई सुबहा नहीं,
जब आँखों में आंसूं न आये,
ऐसी कोई रात नहीं,
जब दिल को तुम याद न आये.
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर हर एक छन मैं,
तुम्हारी चरणों में नमन करता हूँ.
तुम्हारी चरणों में पिता,
मैं भी अभिनन्दन करता हूँ,
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर दिल से तुम्हारा बंदन करता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


माँ की ममता मिल जाए,
तो जीना है आसान।
जन्नत ले जा ए खुदा,
तू दौलत ए इंसान.
कुटिया में भी रह लूंगा,
मैं अपनी माँ के साथ.
सुखी रोटी में भी,
भर देती है जो स्वाद।
माँ के हाथ का भोजन मिल जाय,
तो जीना है आसान।
जन्नत ले जा ए खुदा,
तू दौलत ए इंसान.

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी


दिल चाँद बनके आज भी घटता – बढ़ता रहता है,
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.
इतने कांटो से जख्मो को पाकर भी,
ये बागों में जाकर फूलों को चूमता रहता है.
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.

परमीत सिंह परवाज

अतीत का चुम्बन


मैं भुला नहीं हूँ, आज तक तुझे,
पर भूलने लगा हूँ, मैं जमाना।
मैं नशा नहीं करता हूँ, पर अब,
ढूढ़ने लगा हूँ बहना।
तेरी गलियों से मेरा, कोई अब रिश्ता नहीं,
फूलों की बागों में भी, अब मैं नहीं जाता।
मेरा किसी से नहीं है, अब प्रेम कोई मगर,
हर कोई चाहता है, न जाने क्यों मुझसे याराना।
इन होठों को याद नहीं अब वो चुम्बन,
ना इन पलकों को याद है अब वो रात.
ठोकरों में हूँ मैं आज भी सही,
मगर सिख गया हूँ मुस्कराना।
खुदा की दुनिया से मेरा मोह,
है तेरे हुश्न से जयादा,
खुदा पे ही छोड़ दिया है अब मैंने,
मेरा आने वाला हर फ़साना।

 

परमीत सिंह परवाज

गलती


रात के अंधेरे से,
मत डर दिल,
रात में ही तो,
दियें जलते है.
बहती हुई नदियों,
में क्या रखा है,
ठहरे हुए पानी में ही,
कमल खिलते हैं.
ये तो मेरी गलती थी,
तेरी बस्ती में मांगने आ गया,
यहाँ तो दिल भी,
लोग तिजोरी में रखते हैं.

परमीत सिंह परवाज

जवानी के लिल्ला


देख अ जवानी के लिल्ला,
एगो मुस्की पे,
हिलअइले बारी जिल्ला।
चलावअ तारी हसुआ घांस पर,
लेकिन,
चिरअ तारी हमार सीना।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी जिल्ला।
बैला मारखाव भी आके,
इन्कारा आगे,
हो जाला एकदम सीधा।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी जिल्ला।
अंखिया में कजरा डाल के,
चुनर के अपना छान के,
लीलअ तारी बीघा – पे – बीघा।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी,
धुरंधर सिंह के जिल्ला।