नयका धान


जब से जवान भइल बारु,
नयका तू धान भइल बारु।
चमकअ तारु, उछलअ तारु,
चवरा से लेके खलिहान तक.
लूटअ तारु, धुनअ तारु,
गेंहूँ से लेके कपाश तक.
सारा जवार ई दहकता तहरे,
जोवन के ई लहक से.
बुढऊ के मन भी बहकता,
तहरे आँचल के उफान पे.
खेलअ तारु, खेळावअ तारु,
आँचरा में सबके बाँध के.
रगरअ तारु, झगड़अ तारु,
चढ़ के सबके दूकान पे.
जब से जवान भइल बारु,
धुरंधर सिंह के धान भइल बारु।

दिलवर


मैं हौले-हौले दिलवर, तुम्हारे पास आऊंगा,
कभी मैं मोहब्बत करूँगा, कभी सताऊंगा तुमको।
आईने की जरुरत ही क्या हैं, मेरी आँखे है तुमपे,
कभी मैं शिकायत करूँगा, कभी सजाऊंगा धुरंधर सा तुमको।

प्रेम इतना


पिता- पुत्र का प्रेम इतना, प्राण निकल गए राम पे।
दसों दिशा को जीतने वाले, उठ न पाये पुत्र- वियोग में।
भाई-भाई का प्रेम इतना, प्रियेशी को छोड़ गए राम पे।
छोड़ के उर्मिला को दौड़े, लक्ष्मण पीछे- पीछे राम के।
भाई-भाई का विरह इतना, मुख मोड़ गए भरत माँ से।
छोड़ दिया हर सुख जीवन का, बस राम के एक खड़ाऊं पे।
बंधू-बंधू का प्रेम इतना, भूल गए केवट हर धर्म-धाम रे।
पार लगाया सरयू के, बस पखार के पाँव राम के।
पति-पत्नी का प्रेम इतना, राम दौड़े एक सवर्ण मृग पे।
मायापति ही छले गए धुरंधर सिंह, सीता के प्रेम में।

जामे-मोहब्बत


हुस्न ने आज हमें आँखों से नहीं, ओठों से नहीं, शब्दों से पिलाया है,
जब उसने धुरंधर सिंह को “मनीष मल्होत्रा” कह कर बुलाया है.
मिलता नहीं है कोई इस बाजरे-किस्मत में मंजिल तक साथ देने को,
मगर राहे-सफर में किसी ने आज हमें क्या जामे-मोहब्बत पिलाया है.

मोहब्बत


दिल तोड़ के मेरा तुम मुस्कराने लगे,
मोहब्बत क्या है ये बताने लगे.
आँखों से जो दुनिया दिखाई थी मुझे,
ओठों तक आते-आते जुठ्लाने लगे.

शौक


मयकदा और ये जाम तो है, हारे हुए सल्तनतो के लिए,
लूटा हुआ ये फकीर धुरंधर सिंह शौक रखता है आज भी तेरी लबो का.

प्यार


प्यार तभी सफल हो सकता है जब आप संत बन जाये, परमीत.

वर्ना असफल प्यार के दर्द के साथ इस भीड़ में सामिल हो जाये.

 

कुत्ते


यहाँ-वहां हर तरफ, हर रह में,
खर्डे हैं अनजाने कुत्ते,
अंधकार में भोंक रहे
जाने किसकी चाहत में.
दुर्लभ है एसा सानिध्य,
दोड़ रहे हैं एक साथ,
जाने किस मंजिल की चाहत में.
चीरते हैं अंधकार की खामोसियाँ,
चमकाते हैं आँखों को, जैसे
आसमां की बिजलियाँ.
पुकारते हैं, सर को
आसमां की तरफ कियें,
गा रहे हैं गीत मिलन का वलेंतिने’स डे पर,
ना जाने परमित, किस की चाहत में.

मुझे उठ के लड़ जाने दे मेरी माँ


एक बार मुझे उठ के लड़ जाने दे मेरी माँ,
तेरी आबरू, तेरी आरजू सब सवारूँगा.
हंस के रौंद गए हैं जो हमें,
उनके हर निसान को मिटा के जाऊंगा.
रख न सका जो इस जुबान को,
तो तेरी चरणों में सर कटा के जाऊंगा.
फिर से लहलहाएगी हरियाली,
फिर से तेरा दमान खुशहाल होगा,
ऐसे सजाऊंगा तेरा आँचल,
तेरे सर पे सोने का ताज होगा.
एक बार मुझे उठ के लड़ जाने दे मेरी माँ,
हर तरफ तेरा जय – जैकार होगा.

सैया


सैया देलन एगो गुलाब अंखिया से अंखिया लड़ाके,
फिर त अ सो नहीं पायी मैं, बहियाँ में उनके जाके।
सखी कैसे कहीं सब बात, सब लूटा देहनी होश गवां के।
ना मैं कुछ बोल पायी, ना आँखे खोल पायी,
भाया तो मुझे कुछ नहीं पर ना मैं परमीत को रोक पायी।
सैया पहनाने लगे चूड़ी अंखिया में अंखिया डाल के,
फिर सो नहीं पायी मैं, बहियाँ में उनके समा के।