प्यार


मैं दिल को ये कहने लगा हूँ की,
प्यार झूठा होता है, और
धुरंधर ये जूठ बोलने लगा है.

पिला मेरे साकी


इस कदर तू पिला मेरे साकी,
की जीने की तमन्ना फिर से बने.
जाते- जाते भी तेरे दर से,
खुसबू तेरी ही दामन में रहे.
काले चादर में लिपटी,
मेरी दुल्हन आ रही है.
की उसके आगोस में जा कर भी,
धुरंधर के सीने में तेरी यादे रहे.

सुभद्रा-अभिमन्यु


चंचल मन, कोमल तन,
बालकपन में अभिमन्युं।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
माँ का दूध पीते – पीते,
पहुंचा रण में अभिमन्युं।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
चारों तरफ सेनाएं सुसज्जित,
बीच में अकेला अभिमन्यु।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
द्रोण-कर्ण के तीरों को,
तिनकों सा उड़ता अभिमन्युं,
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
कर्ण के पूछने पे परिचय, बोला
माँ मेरी सुभद्रा, मैं उसका अभिमान-अभिमन्यु।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।
एक अर्जुन से बिचलित कौरव,
के समुख काल सा धुरंधर अभिमन्युं।
अभिमन्युं-अभिमन्युं।

अभिमन्यु


मैं अपनी तीरों से,
नभ में तेरा नाम लिखूंगा।
हर एक पल में मेरी माँ,
तुझे प्रणाम लिखूंगा।
द्रोण-कर्ण भी देख लें,
माँ शौर्य तेरे दूध का.
जब मैं धुरंधर उनकी तीरों से,
चिड़िया बनाके उड़ाऊंगा।
ना यूँ कम्पित हो माँ,
भविष्य की कल्पना से.
मैं लाल तेरा हूँ माँ,
तेरा ही कहलाऊंगा।
द्रोण के चक्रविहू को तोड़,
वहाँ पुष्प खिलाऊंगा।
और उन पुष्पों से माँ,
रोज तेरा आँगन सजाऊंगा।

कंगन मैंने खरीदे हैं


इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
हाथों में चूड़ी है,
आँखों में काजल,
कानो में कुण्डल है,
पावों में पायल,
की कंगन मैंने खरीदे हैं,
वो कब पहनेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
बादल बरसते कितने मिलें,
उपवन में कितने ही फूल खिलें,
जो मन को मेरे छू ले,
वो कहाँ है शूल,
ह्रदय-आघात तो बहुत मिलें,
वो कब हृदय को सिचेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।
राते जब आ-आके,
करती हैं मुझसे बाते,
तो सीने में उठती हैं,
लाखो जज्बातें,
की बासुरी तो बजा दी है प्रेम की,
धुरंधर ने,
वो मीरा बनके कब नाचेंगी मेरे ईस्वर।
इम्तहान मेरे जीवन की,
कब होगी मेरे ईस्वर,
मैने उनको चुन लिया है,
वो कब चुंनेंगी ईस्वर।

माँ


माँ ने कहा था बचपन में,
तू लाल मेरा है लाखों में.
दुनिया मुझ पे हंसती रही,
पर माँ ने चूमा माथे पे.
आँचल में बिठाया,
बाहों में उठाया,
एसे रखा मुझे,
जैसे कोई रत्न रखा हो,
दुनिया से छुपा के.
समय इतना बदल गया,
मैं राजा से रंक बन गया.
हर रिस्ता टुटा मेरा प्रेम में,
फिर भी रखती है माँ धुरंधर,
को सीने से लगा के.

प्रिये


न रूठों प्रिये,
यूँ मुख मोड़ के.
की हम जियेंगे कैसे,
बिना इन ओठों के.
चाहो तो हर लो,
अब प्राण मेरे.
पर दूर न जाओ,
मेरी इन बाहों से.
की हम जियेंगे कैसे,
बिना इन ओठों के.
न रूठों प्रिये,
यूँ मुख मोड़ के.
की हम जियेंगे कैसे, परमीत
बिना इन ओठों के.

माँ का लाल


तेरे वास्ते ए माँ, मैं लौट के हाँ आऊंगा,
न तू उदास हो, मैं रण जीत के ही लौटूंगा।
आज समर में देख ले, ज़माना भी बढ़ के,
क्या द्रोण, क्या कर्ण,
सबको परास्त कर के ही लौटूंगा।
तेरा दूध ही मेरे शौर्य का प्रतीक है,
और क्या चाहिए, जब मुझपे पे तेरा आशीष है.
ना कृष्णा का, ना अर्जुन का,
मैं बस परमीत, लाल माँ तेरा कहलाऊंगा।

दामाद


चढ़ के अइलन सूरज माथा पे,
अब तअ उठीं न हमार सैयां।
कब तक दही पे ई छाली जमीं,
कभी तअ चखी मठ्ठा-छाज सैयां।
सबके धान के बिया गिर गइल,
तनी सीखी न जाए के बथान सैयां।
रतिया में करेनी सब आपने मनमानी,
दिन में तअ तनी करी दूसर काम सैयां।
जाने बाबू जी कौन लक्षण देखनी,
की बाँध देनी हमारा साथ सैयां।
देखे में तअ अतना सीधा बानी,
पर बात-बात में फोड़े नी कपार सैयां।
रोजुवे नु माई पूछअ तारी,
अब बताई, बोली कौन बात सैयां।
गंगा नहइली, कतना पियरी चढ़ाइली,
तब जा के मिलल इह परमीत दामाद सैयां।

माँ का आँचल


शेर की दुनिया इतनी छोटी क्यों है?
क्यों जंगल में शेर अकेला बैठा है?
हाथियों का झुण्ड, हिरणों का समूह,
फिर शेर क्यों गुमसुम अकेला है?
बल से नहीं प्रेम से जीतो,
बल से तो सिर्फ पत्थर टूटता है.
माँ के आँचल में सो के देखो,
यहीं पे सबकी किस्मत बदलता है.
खुदा की चाहत में भटकने वालों,
यहीं पे, परमीत, हर खुदा बसता है.