दिलरुबा


अभी- अभी तो दिल तोड़ा है,
तेरे नैनों के मयखाने में.
फिर क्यों पूछती हो दिलरुबा,
हाल मेरा इस जमाने से.
बदल लिया है परमीत ने धड़कनो को,
तेरी खुशियों की खातिर.
फिर क्यों हो इतनी आतुर,
आने को मेरे जनाजे में.

सुनहरे पल


सुनहरे पलों की याद में,
कुछ पल इस कदर गुजर गए,
की वफ़ा की उमिद्द में हम,
वेवफाई पे उतर गए.
वो मुस्करा कर बोली की,
तुमने मुझे ठगा तो जरुर,
पर एक दिन,
पछताओगे परमीत इस जमाने में,
इसी एतबार से, हम तुम्हे छोड़ रहें.

माँ


एक पल जो रात कटे पलकों में उनके,
तो खुद तेरी खातिर मैं हज हो आऊँ.
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो मेरी आँखों को खुदा तू दीखता नहीं।
एक पल को जो रौंद दूँ जामने को,
तो सनम तेरी लबों को चुम ले परमीत,
पर एक पल भी मैं दूर रहूँ अपनी माँ से,
तो सनम तेरी लबों में वो मिठास नहीं।

लम्हा


अजी आप थीं,
बगल में, इसलिए,
मैं भूखा ही रह गया,
खाली जाम ओठों से,
लगा के.
अजी आप थीं,
बगल में, इसलिए,
मैं सोता ही रह गया,
खुली आँखों से,
सपने सजाते- सजाते।
एक बार ही सही,
आपने रखा जो हाथ,
मेरे सीने पे,
हर लम्हा जी गया परमीत,
बस यूँ ही पास आते-आते.

प्रयास


उल-जुलूल,
हरकते,
अब बंद कर
ए दिल,
कब चाँद धरती पे,
आने वाला हैं.
प्रयास ही करना है,
तो, नहर बनाने में कर,
कब तेरी फसलों को,
सागर आके सींचने वाला है.
कलियाँ जो खिल नहीं सकती
बागों में तेरे,
उनके लिए, अपनी जमीं को,
न छोड़, परमीत
की कब कलियों से,
बचपन पलने वाला हैं.

लाहौर के बादल


वो लाहौर की हैं,
या फिर कराची से,
दिल कहता है,
की कोई रिश्ता है,
उनका मेरे काशी से.
आँखों में वही,
काजल हैं,
जो उड़ता है,
धुंवा बनके,
अब भी मेरे,
गाछी में.
एक नजर से ही,
वो अपने,
सोंख गयीं,
दिल में उठती,
गंगा की हर,
धारा को.
बादल उठें है ये,
पेशावर से,
या बलूचिस्तान से,
पर बरस रहे हैं, परमीत,
ये तेरे,
दिले-हिंदुस्तान पे.

माँ


कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
किस्मत बदलती है,
बस माँ दोस्तों।
वो दबाते रहे तलवे,
मौलवियों- शंकराचार्यों के,
मैंने चूमा चरण एक बार माँ के,
सितारे चमकने लगे हैं,
मेरी कदमो में आके.
कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
हर विघ्न बेटे का,
हरती है बस माँ दोस्तों.
कोई समझता नहीं है,
ममता के आँचल को,
किस्मत बदलती है,
परमीत, बस माँ दोस्तों.

मीठी नींद


पिता,
इसलिए नहीं की,
कोई गोद नहीं है,
मैं रोता हूँ.
पिता,
इसलिए भी नहीं,
की खाने पे कोई,
साथ नहीं है,
मैं रोता हूँ.
और,
इसलिए भी नहीं की,
कोई रहनुमा नहीं है,
मैं रोता हूँ.
बल्कि,
इसलिए रोता हूँ,
की अब वो नजर नहीं,
जो मुझमे एक अच्छाई,
ढूंढ सके.
वो जिगर नहीं,
जो हमारी नजर को,
पढ़ सके.
वो दर नहीं,
जहाँ मैं दो घडी,
चैन पाने के लिए,
आँखे बंद कर सकूँ, परमीत।

बेवफा


प्यार बिकता है इतना भी,
मैंने जाना न था हाँ कभी,
वो साड़ी में थीं मेरे,
पहने पायल किसी और की.
जिनकी तस्वीर सजाता था,
दीवारों पे अपने,
वो बाहों में थी मेरे, परमीत
सपने सजायें किसी और की.

दाग


दरिया जैसी उछलने लगी मैं,
परमीत ज्यों-ज्यों ये रात ढली,
अब चाँद से कैसे नजरे मिलाऊँ,
जब अपने दामन में ही दाग लगा बैठी।