तन से गिरा दिया है आँचल,
अब, मन से ना गिराइये।
त्याग मेरा और मेरे तन का,
मुझको स्वीकार है,
पर अपने मन से ना निकालिये।
बुझ दूंगी मैं अपने रूप लावण्या,
के इस जलते अंगार को,
पर आप किसी और के रूप,
को न निहारिये, परमीत।
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Every thing is related to love and beauty
परमीत और पराजय
ठोकर खायी मोहब्बत में जिस दिन,
मुझको भी नारी का ज्ञान हुआ,
अभिमान था मुझे अपने योवन पे,
पर मैं भी भीष्म सा पराजित हुआ.
लेकर जिनको बाहों के घेरे में,
मैं इतराता रहता था,
जब चौरस खेली उनके नाम की,
तो मैं भी युधिष्ठिर सा पराजित हुआ.
मैंने उखड़ा है कितने ही सर्पो के,
जबड़े से उनके दांतों को,
मगर बात आई जब मेरे जीवन की,
तो परमीत,
मैं भी परीक्षित सा पराजित हुआ.
माँ
अंगों से खेला हूँ,
रंगों से खेला हूँ,
पर आज भी तरसता हूँ,
माँ के लिए.
जुल्फों में सोया हूँ,
बाँहों में सोया हूँ,
पर आज भी बिलखता हूँ,
माँ के लिए.
ओठों को चूमा है,
पाँवों को चूमा है,
पर आज भी तरपता हूँ,
परमीत, माँ के लिए.
माता-पिता
अगर न होते माता-पिता,
तो कैसा होता बचपन,
भूख से बिलखता मैं,
और, कचरे में ढूंढता भोजन।
अगर न होते माता – पिता,
तो कैसा होता योवन,
जुवा खेलता गलियों में,
और, करता मदिरा-सेवन।
अगर न होते माता – पिता,
तो कैसा होता जीवन,
मैं गुलामी करता किसी का,
और, लोग करते मेरा शोषण।
मैं शेर सा दहाड़ता हूँ,
परमीत, जाकर हर एक वन,
अगर न होते माता-पिता, तो,
गिदर सा उठता, किसी का जूठन।
मैं उस पिता का पुत्र हूँ
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो धरती पे किसी से हारा नहीं,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो उर्वशी पे भी डिगा नहीं।
खडग उठा लिया है जब,
तो करो मेरा सामना महारथियों,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका तीर कभी चूका नहीं।
शिशु समझ के मौत का भय,
किसको दिखा रहे हो,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो रण में शिव से भी डरा नहीं।
तुम उन्माद में हो अपने शौर्य के,
मैं जवानी में चढ़ के आया,
रौंद के हर दिशा से जाऊँगा तुम्हे,
ये अपनी माँ से मैं कह के आया।
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका रथ कभी रुक नहीं।
मैं उस पिता का ‘परमीत’ पुत्र हूँ,
जिसका धवज कभी झुका नहीं।
माँ
मांगता नहीं हूँ मैं,
किसी से,
दुआ जिंदगी कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
सागर कि लहरें चाहें,
डूबा दें किनारा,
तोड़ नहीं सकती हैं,
वो मेरा हौसला.
आसमाँ जला दे चाहें,
गिरा कर बिजलियाँ,
नहीं मिटा सकती है,
वो मेरा काफिला.
डरता नहीं हूँ मैं,
देख के,
भीड़ दुश्मनों कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
मांगता नहीं हूँ मैं,
किसी से,
दुआ जिंदगी कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
माँ
जब धरा पे मैंने,
चलाई कुदाल,
तो धरती बोली,
पाँव तो सम्भाल,
मेरे लाल, परमीत।
साजिस
कभी वो हुस्न थी,
और मैं इश्क था
आज वो बेचैन हैं,
और मैं शांत सा.
कभी वो रात थी,
और मैं ख्वाब सा,
आज वो दरिया हैं,
और मैं सागर सा,
कि वक्त ने जब भी,
कि हैं मुझे तोड़ने कि साजिस,
मिट जाने से पहले,
मैं उठा हूँ परमीत लहरो सा.
परमीत और मेनका
वो रात भर मेरी बाँहों में,
रक्त का संचार बनी,
मेरे हृदय कि धड़कने,
मेरी साँसों कि रफ़्तार बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
उड़-उड़ के उनकी जुल्फे,
गिरती हैं मेरे मुखड़े पे,
आँचल ढाल कर उनके काँधे से,
लिपटा है मेरे सीने से,
मासूमियत से दूर,
वो मेरी मुस्कान बनी.
इन काली-काली रातो में,
मेरे जीवन का आधार बनी.
अधखुली पलकों से,
वो देखती हैं मेरे तन को,
अभी भी दबी,
अपने सरमोहया के बोझ से.
उनके योवन कि खामोसी,
मेरी जवानी कि चीत्कार बनी.
पल में वो दूर जाती,
पल में पास आ रही,
अपनी जुल्फो कि उलझन से,
खुद उलझती जा रही.
उनकी ये विवसता,
मेरा राजपूती अहंकार बनी.
न रोसनी कि चाहत,
न उची उड़ान कि,
लगता हैं प्यारा अब ये अंधकार,
उनकी जुल्फे मेरी पाश बनी,
लो टूट रहा मेरा ब्रह्मचर्य परमीत,
वो मेनका-अवतार बनी.
सर्वश्रेष्ठ-रिश्ते
मेरे बैलों कि जोड़ी बड़ी अनमोल है,
एक सीधा तो एक मुहजोड़ है.
बहते है दिन भर पछुआ में,
अरे ये तो बड़े बेजोड़ है.
देख के हल मेरे काँधे पे,
उछलने लगते है ये नाद पे.
अपने सींगों,
पे उखाड़ दे पहाड़ को,
ताकत में ये बेमिशाल हैं.
बहते हैं खेत में झूम -झूम के,
लौटते है घर को,
मिटटी उछाल-उछाल के,
मेरी जवानी के,
ये रिश्ते सर्वश्रेष्ठ हैं परमीत