गड़ासा प्यार में


लिए गड़ासा चल पड़ा हूँ प्यार में,
आज काट के लाऊंगा पूरी घांस रे,
फिर खाना मस्ती में मेरे बैलों,
लगाऊंगा हरियाली जब तुम्हारे नाद में.
इस गावं में या उस गावं में,
चाहे गुमेजी से या चंवर से,
पर लाऊंगा परमीत आज घांस मेरे बैलों,
फिर खाना मुँह डूबा के नाद में

अभिमन्यु


काश तुम होते हमारे साथ पिता जी,
तो हम यूँ अकेले न होते।
इस मोड़ पे जिंदगी के,
यूँ तन्हा-तन्हा न होते।
अभिमन्यु बढ़ा है,
तुम्हारी शान में,
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल इस मैदान में,
जग करता रहेगा,
तुम्हारा गुणगान पिता जी,
काश तुम होते हमारे साथ पिता जी।

गुलाब और परमीत


आज तो मेरे १४ साल के दोस्त गुलाब ने भी दोस्ती तोड़ दी. मैंने सोचा क्यों ना विदेशी धरती पर विदेशी कन्या को प्रेम-निवेदन किया जाय. आज तक मैंने जितने भी प्रेम-निवेदन कियें, उनमे मेरे दोस्त ने हमेशा साथ दिया चाहे जितनी भी जिल्लत हुई हो, लेकिन आज उसने साफ़ इनकार कर दिया. आखिर कब तक वो मेरा साथ दे या अब उसे मेरे दोस्ती में वैसा मज़ा नहीं मिलता. जैसे ही मै आज उससे मिला और अपना मकसद बोला पाहिले तो उसने मुझे हतोसाहित किया, फिर बात ना बनता देख बोला की अब उसमे धीरज नहीं की, वो और जिल्लत नहीं सहेगा. अरे भाई मेरे हाथ में आने पे उसकी किस्मत क्या हो जाती है. पैरों के नीछे कुचलना तो दूर कोई उसे छूता भी नहीं. उसने आखिर में एक सवाल पूछा की क्या अब तक किसी ने मेरे हाथ से उसे ग्रहण किया है. और उसने मुझे कहा की वो अब मेरा साथ नहीं दे सकता. मेरे साथ रहने पर उसका अर्थ, उसका प्रेम-प्रसंगता नष्ट हो जाती है. मैंने भी आज अपने दोस्त को अलविदा कह दिया. उसने सोचा की अब शायद मै कुछ नहीं करूँगा. उसने मुझसे कहा की बुरा नहीं मानना , ये तेरे भलाई के लिए कर रहा हूँ. मैंने कहा दोस्त मै आज बोलू भी तो कोई फायदा नहीं. परमित सिंह तो तुम्हारे बिना भी प्रेम-निवेदन कर सकते है, ये तो तुम थे जिसने कहा था १४ साल पहिले, की आज कल कोई प्रेम समझता नही, मनुष्य अब प्रेम के महत्व को समझता ही नहीं. जब लोगो ने तुम्हे छोड़ दिया था तब मैंने तुम्हारी महानता को दर्शाया. मेरी आवाज ही काफी है मेरे लिए. मै चल निकला अपनी राह. गुलाब ने भी वैसे ही हंसी बिखेरी जैसे आज तक उन सभी ने जो मेरी मदद लेने के बाद मुझे वेव्कुफ़ कह कर मुझ पर हँसते है. अपनी दबी हुई हंसी में उसने कहा, नहीं बदलेगा साला परमीत सिंह, मैंने सुना दर्द हुआ, लेकिन फिर सोचा हर किसी की चाहत ये ही है की मै बदल जाऊं और तब जब वो धोखा दे कार्य समझाने की कोशिस करते है की उन्होंने धोखा नहीं दिया. मै दो पल रुका और पलट कर बोला की बदलना उनकी आदत है जिनकी सुन्दरता गुलाब पर निर्भर होती है…………..परमीत

होलिका-दहन


रंगे-मोहब्बत चमक उठती है,
आज भी,
उनके एक नज़र मिलाने से,
दर्दे-जिगर को,
क्या समझाउं परमित,
जो आज भी बहल जाता है,
उनके सिर्फ मुस्कराने से.
वो खेल जाती हैं होली,
आज भी,
मेरी तमन्नावों से,
एक कसक सी उठती है,
जब फरेबे-मोहब्बत की,
जो उनके सिने में.
की जाने कब तक लुटता रहेगा,
यूँ ही मेरा आसियाना,
हर साल आ जातीं है वो,
होलिका-दहन मानाने,
मेरे ही आँगन में.

दर्दे-उल्फत


बहुत खुसनसीब हैं वो लोग,
जिनको कद्रदान मिलें,
हमें आज तक, जो भी मिले,
सिर्फ, अनजान ही मिलें.
की,
दर्दे-उल्फत अब क्या कहें तुमसे,
की,
कसीदे पढ़ें हमने जिनकी
तारीफें-मोहब्बत में,
उनको भाया वो,
जिससे मिलते हैं वो
चोरे-बाज़ार में.
उनको हमारा इश्क में,
अंदाजे-जिगर नहीं भाया,
वर्ना,
चोर-बाजारी तो हम भी करते हैं,
और, वो जिगर नहीं रखते,
उनके इश्क का परमित,
जिनका, अंदाजे-बयां वो,
अपने शर्मो -हया से करते हैं.

नया जाम


मेरी जिंदगी अब मुझे,
एक नया अंदाज दे,
कुछ नहीं तो दर्द को मेरे,
एक नया आसमां दे.
लौट सकता नहीं अब मैं,
उनके दामन में परमित,
कुछ नहीं तो मेरी ओठों को,
एक नया जाम दे, परमीत.

होली


सरहद पे हैं शातिर खड़े,
हम कब तक तुम्हे प्यार करें,
लूट जाएंगी ये सल्तनत मेरी,
अगर हम,
यूँ ही तेरी बाहों में रहे.
धीर बन के कर इंतज़ार मेरा,
फिर रंगूगा तुझे नए रंग से,
वैसे कमी नहीं संसार को मेरी,
तू चाहे तो, परमीत
खेल ले होली किसी और के संग में.

लाखो में एक है माँ


कौन कहता है कि झुड़ियां,
खूबसूरती को मिटा देंती हैं,
मेरी माँ आज भी,
लाखो में एक है, परमीत।

प्रथम-मिलन III


पलकों पे इतना,
भी न शर्म लाइए,
इन जवाँ रातों को,
न यूँ सुलाइए।
प्यास जो हैं मेरे,
इन ओठों पे,
आज अपनी लबों से,
उसे चुरा लीजिये।
छूने से ही अगर,
इतना सिमट जाएंगी,
जाने फिर वो घड़ी,
अब-कब आएगी।
आंचल को इतना,
भी न तन से बांधिए,
इन जवाँ रातों को,
न यूँ सुलाइए।
तोड़ कर,
किनारों को अपने,
दरिया को आज,
परमीत के सागर में,
मिल जाने दीजिये।

प्रथम-मिलन II


ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये।
कब तक मैं सम्भालूँ,
ये शर्मो-हया,
आज, अभी, इसे,
यहाँ टूट जाने दीजिये।
सीने में दबा के,
आँचल में छुपा के,
रखा है बरसों से,
जिसे राहों में बचा के,
आज, अभी, उसे,
यहाँ लूट जाने दीजिये।
ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये।
कब तक मैं ही रहूँ,
बंध के रिवाजों से,
अरमानों को अपने,
यूँ दफना के,
जल रही है दिया,
जो कई रातों से,
आज, अभी, उसे,
यहाँ बुझ जाने दीजिये।
ढल जाने दीजिये,
ढल जाने दीजिये,
आँचल को मेरे,
ढल जाने दीजिये, परमीत।