प्रथम-मिलन I


न देखिये,
मुझे प्यार से,
कि हया अभी,
इन आँखों में है.
तन तो आ गया,
बन के दुल्हन,
मन अभी भी,
उस आँगन में है.
न छेड़िये,
मेरे दिल को,
कि उसमे,
अब भी, परमीत
बाबुल ही है.

अनमोल माँ


रिश्ते दरक,
गएँ हैं,
इस कदर,
कि बहने लगे हैं,
यादें अब,
मवाद बनकर।
सुखी डालों पे,
अब भी,
लगे है,
हरे पत्तें,
जो,
बिलख रहे हैं,
जावानी में ही,
अपनी जड़ों,
से बिछुड़कर, परमीत।

इश्क और गंजापन


इश्क इतना भी न कीजिये,
बस रातें ही जीवन में हो.
वो तो बसा लेंगी अपना घर,
कहीं आपका ही आँगन सुना न हो.
इश्क इतना भी न कीजिये,
बस रातें ही जीवन में हो.
वो तो लहरा लेंगी जुल्फें,
किसी और के चेहरे पे,
कहीं आपके माथे पे,
गंजापन न हो.
इश्क इतना भी न कीजिये,
बस रातें ही जीवन में हो.
लूट कर हज़ारों कि महफिले,
वो पूजी जाएंगी सीता बन कर,
कहीं तुम्हारी सच्ची मोहब्बत,
रावण कि तरह जलती न हो.
इश्क इतना भी न कीजिये,
बस रातें ही जीवन में हो.
ये दस्तूर है इस जामने का,
सावित्री बना के उनको रखना,
कहीं कोई तुम्हे यमराज,
कह के गलियाता न हो, परमीत

किताबें या प्रेमिका


क्यों खरीदता हूँ मैं इतनी किताबें,
हर शख्श पूछ रहा है इस बाजार में,
क्या नहीं है कोई मेरे जीवन में प्रेमिका,
जो अनजान हूँ मैं साजों-श्रृंगार से.
मुस्कुराता हुआ चला जाता हूँ,
बिना किसी विवाद में उनसे,
क्या कहूं उनसे, कि किस कदर,
अनजान हैं वो, अपने जीवन में,
बहन-भाई-माँ के प्यार से, परमीत

चूड़ी


इतनी दुरी भी न रखिये,
कि जीना भी मुश्किल लगे,
चूड़ी इस कदर न तोड़िये,
आइना भी अब सौतन लगे, परमीत

कक्षा बारह की मोहब्बत


वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रुक-रुक कर चलती थीं,
मैं चल-चल के रुकता था।
वो किताबों कि दुकानों पे,
उनका पन्नों कों पलटना,
औटो में बैठे-बैठे,
उनका उतर जाना।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रुक-रुक कर देखती थीं,
मैं देख-देख के रुकता था।
कभी बैठ न सके हम,
संग में नीचे किसी डाल के,
ना छू ही सके हम,
संग में हवावों के झोंकें।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो लिखती थीं अपने पेज पे,
मेरी कलम को ले के,
मैं उनकी कलम से,
अपनी किताबों को भरता था।
जाने कहाँ होंगी,
वो किसकी बाँहों में,
पर दिल ये धड़कता है,
उनकी ही यादों में।
वो अपनी मोहब्बत का,
अंदाज़ ही वैसा था,
वो रोटी भी दांतों से,
काटती थी मुझे देख के,
पीने के ही बहाने, नल पे
छींटे मैं उनपे उड़ाता था।
न लौट के ही आएगी,
वो मेरी जिंदगी,
पीएचडी तक हो गयी,परमीत
न कोई वैसी ही फिर मिली।

सांवरे


मैं रात भर सोती नहीं,
जब तुम आ जाते हो सांवरे।
जब सीमा पे रहते हो, तुम
तो आँखों में यूँ ही नींद नहीं।
अब क्या देखूं मैं आईना,
जब तुम बैठे हो पास सांवरे।
जब सीमा पे रहते हो, तुम
तो मैं कभी सजती ही नहीं, परमीत।

माँ


मेरी बागों में जितने भी फूल खिले है,
तेरी आँचल में जब तक न गिरेंगे,
चैन नहीं है इनकी पखुड़ियों को,परमीत
जब तक ये तेरे पावों को न चूम लेंगे, माँ.

हाले – दिल


जिंदगी जितनी भी दर्दनाक हो,
जवानी मुरझाने नहीं देती.
खुशिया बरसो बाद मिले,
तो वो बांटी नहीं जाती.
बहुत इंतज़ार के बाद जब,
कोई मिल जाए अपना.
तो हाले – दिल परमीत,
आोठों से बयां नहीं होती.

दूध


महान-महान लोगों ने अपनी कलम से माता-पिता के सन्दर्भ में लिखा है. मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि जब मैं किसी को रगड़ देता हूँ तो मुझे मेरी माँ कि याद आती है, और जब मैं किसी को रगड़ने के लिए तैयार होता होता हूँ तो पापा कि याद आती है. जैसे भगवान् हनुमान जी ने कहा हैं कि भगवान् श्री राम के नाम कि महता स्वयं भगवान् श्री राम से भी ज्यादा है. ठीक उसी तरह माँ के दूध कि महता माँ से भी ज्यादा है. अंत में एक कविता जो बचपन में पापा सुनाते थे:
सोलह भैंस के चौंसठ चभाका,
सवा सेर घी खाईं रे,
कहाँ बारन तहार बाघ मामा,
एक ताकड़ लड़ जाईं रे.
नए खून का नया हूँ मैं बांका,
नई मेरी अंगराई रे,
कहाँ बारन तहार, बाघ मामा,
एक ताकड़ लड़ जाईं रे, परमीत.