१४ फ़रवरी


एक बेलन चली,
लखनऊ से,
Chicago,
में गिरी,
वो दिन,
था १४,
१४ फ़रवरी.
चोट लगी,
माथे पे,
दिल में,
दर्द उठी,
वो दिन,
था १४,
१४ फ़रवरी, परमीत

लुटेरा बन जा दिल


आवारा बन जा दिल,
नकारा बन जा दिल,
हर इल्जाम ले ले तू,
हंस-हंस के सीने पे.
पर अपने माँ का,
दुलारा बन के दिल,
दुलारा बन के दिल.
टूट रहे हैं ख्वाब,
हर एक पल में,
टूट जाने दे उन्हें.
छूट रहे है साथ,
हर एक का जीवन में,
छूट जाने दे उन्हें.
लुटेरा बन जा दिल,
बंजारा बन जा दिल,
हर पाप तू कर ले,
इन हाथों से अपने.
पर अपने माँ का,
सहारा बन के दिल,
दुलारा बन के दिल, परमीत.

जिद


कुछ उनकी भी जिद थी,
कुछ मेरी भी गुस्ताखी,
ना वो पीछे मुड़ी,
ना हमने ही नजरे,
कही और डाली, परमीत

घरवाली


रात बड़ी काली है,
साथ घरवाली है,
आँखे लड़ाऊँ,
या चुपचाप सो जाऊं मैं.
पानी बरस रहा है,
छम-छम करके,
बिजली भी चमकती है,
रह-रह के,
छनका दूँ मैं इनके
पायल पावों में,
या चुपचाप सो जाऊं मैं.
आज ही आयीं हैं,
अपने मायके से,
नयी साड़ी में,
सज-धज के,
लोरी सुनाऊँ आज,
प्यार के साड़ी रात,
या चुपचाप सो जाऊं मैं, परमीत

माँ


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जिंदगी है सितारों में,
बस माँ कि दुआ से,
कब माँगा है,
मैंने खुदा बोल,
कुछ भी सिवा,
माँ कि निगाहों के.
क्या रखा है,
जन्नत में,
क्या चाँद कि,
आदावों में,
कब चाहा है,
मैंने खुदा बोल,
कुछ भी सिवा,
माँ कि चरणों के, परमीत.

 

माँ


जुमला वो ही पढ़ो,
जो जानकारी दे,
बरना क्या रखा है,
हिंदी में, उर्दू लिखने में.
साँसे जितनी भी जियो,
जियों शान से मगर,
बरना क्या रखा है,
मयखाने में,
मंदिर जाने में.
चाहे जो भी करो काम दोस्तों,
पर आंसूं ना आयें माँ कि आँखों में,
बरना क्या रखा है,
टाटा होने, बिरला होने में, परमीत.

कलम और तन्हाई


इस कदर लूट के मेरी तन्हाई मुझे
तुम हंसती हो मुझपे मेरे ही द्वार पे,
सुख गयी मेरी कलम जिस,
तेरी योवन को सजाते-सजाते,
और तू आज भी आती है,
मेरे पास है तो बिना श्रृंगार के.
सोचा था जिन ख़्वाबों को हकीकत,
बना के सजाऊंगा उनकी जुल्फों में,
वो ही हंसती हैं मेरी काली रातो पे,
निराश हो गयी मेरी कलम,
जिस आशा को लिखते-लिखते,
और तू आज भी आती है,
मेरे पास है तो वो ही सब्जबाग ले के, परमीत

वो जिनकी याद में दिल ने आघात कर दिया….


मयखानों से दूर,

मस्तानों से भी दूर,
ये शाम ढल रही ,
तन्हाई में मसरूफ.
बीते साल में वो मेरे साथ थीं,
अपनी जुल्फों की जंजीर में मुझको बांधके.
मेरे दर्द को, मेरे गम को,
जो पिघला जाती थीं,
अपने अधरों के ताप से.
की,
जिन्दगी में एक नया साल आ गया,
कोई मिलता ही नहीं जो सुने परमित इस दीवाने की.

हुस्न और खंजर


 

आज आँखों से पिलाया है,
कल ओठों से पिलायेंगी,
उस दिन समझोगे मोहब्बत को,
जब सीने में खंजर को उतरेंगी।
न छलक ही पायेगा आँखों से पानी,
न ओठों से ही कुछ कह पावोगे,
आज बाहों में सुलाया है,
कल राहों में दुत्कारेंगी,
उस दिन समझोगे मोहब्बत को,
जब बाजार में लायेंगी।
जिसके मुस्कान पे छोड़ा है घर और द्वार,
वो ही मुस्करा कर दर-दर पे नचाएंगी,
आज गोद में बिठाया है,
कल पावों कि ठोकर लगायेंगी।
उस दिन समझोगे परमीत मोहब्बत को,
जब हुस्न का असली रंग वो दिखाएंगी।

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माँ


एक बेवफा ने लुटा,
मोहब्बत में हमको पिला के,
हर मोड़ पे गिर रहा हूँ,
जवानी में ही मैं लड़खड़ा के.
एक -एक चोट पे मेरे छलकता है,
दर्द पिता कि आँखों में,
और मुस्कुराता है यार मेरा,
मेरे जख्मो पे एक नयी अदा से.
एक बेवफा ने हाँ लुटा,
आँचल में अपने सुला के,
भटकने लगा हूँ अब,
अपनी ही गलियों में आके.
जिसके लिए परमीत ने छोड़ा,
अपनी माँ को रोते हुए,
आज माँ ही बैठी है उसके,
जख्मों को अपने सीने पे लेके.