माँ


सब छोड़ गये मुझको,
जिस मोड़ पे आके हाँ,
बस एक माँ ने लगा के रखा है,
मुझको सीने से अपने हाँ.
सब कुछ लुटा के अपना,
जब रह गया खाली हाँथ,
बस एक माँ ने लगा के रखा है,
मुझको सीने से अपने हाँ.
कितनो को तोडा है,
कितनो को मोड़ा है,
सब भूल गये हमको,
जिस मोड़ पे आके हाँ,
बस एक माँ ने लगा के रखा है,
परमित सीने से अपने हाँ.

कतराना III


मुझे दर्द का,
पता भी नहीं,
और आँखे मेरी,
छलकने लगी.
बड़ी बेवफा,
मेरी महबूबा,
मइयत पे ही मेरी,
वो निगाहें लड़ाने लगी.
शिकवा करें,
तो किस से करें,
जिसे अपना कहा था,
वो गैरों की बाहों में,
अब सिमटने लगी, परमित.

कतराना


तेरी जुल्फें कभी मेरे चेहरे पे भी छाती थीं,
तेरी जुल्फें आज भी लहराती हैं.
बस फर्क इतना ही है हुस्न,
की तू कल तक जिसकी बाहों में थी,
आज उसी से कतराती है.
तू कल भी लाल रंग से सजती थी,
तुझे आज भी लाल रंग में भाती है.
बस फर्क इतना ही है हुस्न,
की तू कल तक जिसकी साडी पहनती थी,
आज उसी से कतराती है, परमित

काली रातों की यादें


ए चाँद तुझसे क्या कहें,
कैसी कटीं हैं रातें,
मैं उमरती थी नदी की तरह,
वो बाँध गयें किनारें-2.
फूलों के ख़्वाबों का,
भी नहीं हैं ये मंजर,
पलकों-से-पावों तक,
वो दे गयें हैं यादें-2.
बिन सवान के बरसातें,
बिन साज बजी मल्हार,
मैं जितना ही इतराती,
वो साध गयें निशाने-2.
कब भोर हुई पलकों में,
कब सांझ ढली आके,
मैं कुछ जान न पाई,
वो इस कदर पीने लगे प्याले-2.
पायल भी जली इर्ष्या के अगन में,
चूड़ी दूर हुई साजन की राहों से,
मैं फँसी इस कदर भंवर में, परमित
वो ले गये बहा के शर्म की मेरी दीवारें-2.

माँ और जावेद की मुंबई


वो महफ़िल में बसी हैं, अपने हुस्न को लेकर,
और पिला रहीं हैं सभी को, ओठों से छलका-छलका कर.
मैं चलता हूँ राहों में, हर कांटे को उठा कर,
जाने कब गुजरेंगी माएँ, नंगे पावँ चलकर.
है जावेद को घमंड जिस मुंबई के योवन पर,
रोज दान करते हैं हम उसे, परमित गंगा में नहा कर….Crassa

हिम्मते-मर्द


आरजुए — मोहब्बत कभी इंतकाम नहीं लेती,
ये तो हुस्न है उनका,जो इश्क को इलज़ाम देतीं.
वो जब मेरे पास थीं, चूम कर रखता था मैं,
फिर रहीं है अब गैरों की महफ़िल में, ठोकरों पे सालामी देतीं.
हिम्मते-मर्द की कभी शाम नहीं होती,
ये तो उनकी बेवफाई है जो उगते सूरज को दीदार देतीं, परमित…Crassa

गोरी और काली रानी


एक राजा की दो रानी,
एक गोरी ,
एक काली-कानी.
एक दिन शिकार में,
राजा हार गये,
शेर के प्रहार से.
कैसे तो जान बची,
पर बिछुड़ गये राजा,
आपने रानी के श्रींगार से.
घोड़े दोड़े ,
मंत्री भागे,
पूरब से पंछिम तक,
कोना-कोना छान मारा,
उत्तर से दक्खिन तक.
राज-पाट सँभालने को,
मंत्री बन गये राजा,
और, रानियाँ भूल गयी,
राजा को मंत्री के प्यार से.
भूलते-भटकते, एक दिन राजा
जा पहुंचे अपने दरबार में,
दुर्बल-मलिन तन को,
पहचान न सकी गोरी रानी,
कानी रानी ने स्वागत किया, परमित
राजा का प्रेम के मल्हार से.

द्रौपदी का प्रेम


जब ठोकरों में तौलती है जिन्दगी,
तो माशूका की जुल्फें भारी होती हैं,
जब रातों के उड़ने लगती हैं नींदें,
तो मेरी माँ, तेरी लोरी याद आती है.
अर्जुन की मोहब्बत को भुला कर,
जब वो दुर्योधन की जाँघों पे बैठतीं हैं,
मेरे भाई, तेरा प्यार आँखों में उतर आता है.
पराजय जब चूमती है मस्तक को रण में,
तो माशूका की बांहें अरुवों की शिविर बनती है.
जख्मों में जब उबलती है रक्त की बुँदे,
तो पिता तेरी गोद, परमित को बहुत याद आती है…..Crassa

रौनके-आस्मां


टूटे हुए तारे से न पूछ रौनके-आस्मां,
उसके दामन में इतने सितारें,
एक मैं टूट भी गया तो उसका क्या.
मुरझाये कलि से न पूछ दास्ताने-गुलिस्ताँ,
उसके पहलु में इतने फूल,
एक मै मुरझा भी गया तो उसका क्या.
आशिक की मौत पे ना पूछ हाले-जिगर महबूबा का,
उसके आँचल में इतने हैं बैठे ,
एक मै मिट गया भी तो उसका क्या.
पूछना ही है अगर तुझे परमित, तो
उस माँ के दिल से पूछ, जिसके बेटे को आशिक बना के ,

किसी ने हलाले-मोहब्बत कर दिया….

दिले-कब्र


उनसे दिल लगा के हम एसे खो गयें परमित,
की घर का पता भी तब चला जब कब्र में आ गयें .