वो उम्र भर की दुआ दे गयीं
नजर मिली तो दवा दे गयीं.
ये शहर ही ऐसा है
की हर कोई अकेला है.
वो किताबों में छुपाकर
अपना पता दे गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
वो उम्र भर की दुआ दे गयीं
नजर मिली तो दवा दे गयीं.
ये शहर ही ऐसा है
की हर कोई अकेला है.
वो किताबों में छुपाकर
अपना पता दे गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
कातिल बड़ी है नजर ये तेरी
प्यासे हैं सब देख जवानी तेरी।
कभी किताबों में कुछ तो हाँ लिख दे
अगर पढ़ नहीं सकती चिठ्ठी मेरी।
परमीत सिंह धुरंधर
है समंदर खामोश अभी की
तन्हाई बहुत है
उम्मीदों पे भारी शहनाई बहुत है.
ये सच है,
जमाने की प्यास मिटाती है दरिया
पर दरिया के यौवन पे
समंदर का बलिदान भारी बहुत है.
परमीत सिंह धुरंधर
जो हमें हमारी आरजू दे गए
कसम से बड़े बेआबरू कर गए.
परमीत सिंह धुरंधर
दू ए गो नथुनिया में लूट अ तारअ राजा
रात में चैन आ दिन में मजा.
कइला बदनाम, भइल सारा जिला में हल्ला
बाली उमर में ही दे दिहलअ साजा।
छुप के – छुपा के आवतानी तहरा से मिले
ओपर तू रखअतार किवाड़ खुला।
परमीत सिंह धुरंधर
सब चाहते हैं जानना की खुदा कहाँ है?
जन्नत कहाँ है?
माँ जिधर कदम रख दे
उससे हसीन भला और क्या है?
परमीत सिंह धुरंधर
अभी बाली बा उमर राजा जी
काहे दे तानी हमके अइसन सजा राजा जी.
रोजे आवेनी छुप के – छुपा के सबसे
आ रउरा रखsतानी किवाड़ खुला राजा जी.
हमरा पे मत ऐसे जुल्म बढ़ाई राजा जी
ना त हम हो जाएम बदनाम बड़ा राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
जब इश्क़ तन्हा हुआ तो समंदर बन गए
जब इश्क़ बेवफा से हुआ तो कलंदर बन गए.
यूँ ही नहीं कहता जमाना की बड़ा शातिर हूँ मैं
दर्द को पी कर हम धुरंधर बन गए.
परमीत सिंह धुरंधर
तन्हाइयों में उर्वसी बनकर
अपने तीक्ष्ण नैनों से ह्रदय में
तरंगे उठाने वाली
विरह की तपिश में मुझे झोंककर
संसार के सम्मुख
मेनका बनकर मुझसे मुख मोड़ लेती है.
जो कल तक प्रेम, धर्म, कर्तव्य, नारी – सम्मान
का बोध कराती, ज्ञान देती
वो स्वर्ग के सुख के लिए
मातृत्व, स्त्रीत्व और गृहस्थ धर्म को त्याग कर
इंद्रा की सभा में नृत्यांगना बनने का
प्रस्ताव स्वीकार कर लेती है.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी ही दर्द है, दर्द ही जिंदगी
हमने तो बस उसे कागज़ पे उतार दिया।
परमीत सिंह धुरंधर