दुल्हन


हारे ऐसे की जमाने ने मज़ाक बना दिया
फिर जीते भी ऐसे की जमाना मज़ाक बन गया.

मगर इस हार – जीत में दोस्तों
हाथों से कुछ फिसल गया.

यह सही है की वक्त भर देता है जख्मों को
मगर वक्त ने ही जाने क्यों जख्मों को हरा छोड़ दिया?

हमने ख्वाब सजाएं जिन हाथों को थामकर
उन्ही हाथों ने, उन ख़्वाबों को हमसे चुरा लिया।

इश्क़ जब भी बेपनाह हुआ है
जमाने से पहले हुस्न ने उसे ठोकर लगा दिया।

चंद मुलाकातों का शौक मोहब्बत नहीं
क्या समझेंगे वो जिन्होंने हर रात नया सेज सजा लिया?

तड़प क्या होती है दिल की उस जिस्म से पूछो?
जिसकी मोहब्बत को किसी और ने अपनी दुल्हन बना लिया।

वो चढ़ गयी डोली बिना एक पल भी सोचे
जाने हुस्न ने कैसे खुद को इतना कठोर बना लिया?

 

परमीत सिंह धुरंधर

हरी मिर्चियाँ


आप उगाने लगे हैं अपने घर में हरी मिर्चियाँ
तो उनका क्या होगा?
जिनको अधरों से लगाकर हम आज तक सिसक रहे हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जवानियों के किस्से


किताबों में पढ़ते रहे ताउम्र जवानियों के किस्से
मगर जब ढलकी तेरी चुनर तो समझे जवानियों के किस्से।

 

परमीत सिंह धुरंधर

खानदानी


शहर भर से मेरा पता मत पूछ
ये दुश्मनी खानदानी है.
पिलाना है तो खुलकर पीला
ये अपनी प्यास पुरानी है.

तेरे जिस्म पे वो रख सकते हैं
सोने – चांदी, हीरे – जवाहरात
पर तुम्हारे वक्षों पे वो दाग
वो तो अमिट एक निशानी है..

परमीत सिंह धुरंधर

समझती नहीं है इश्क़ को लड़कियाँ


धुप में छावं की गरज किसको नहीं
जिस्म हो जवान तो तलब किसको नहीं
समझती ही नहीं है इश्क़ को लड़कियाँ
चाहती है सलमान जो आज तक हुआ किसी का नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

पतली कमर का सिहरना हुआ – 2


शर्म – लज्जा वस् मैं तट पे ही रही
उसका निर्वस्त्र – मग्न
लहरों से खेलना, लहरों में तैरना हुआ.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुपके से पायजेब पहना दूँगा


दरिया में आगा लगा दूँगा
दर्पण में ख्वाब जगा दूँगा
ऐसी बाजीगरी के हुनर
रखता हूँ इन हाथों में
तू बस घूँघट तो उठा
मैं शर्म – हया सब चुरा लूँगा।

तितलियाँ चतुर हैं, चंचल हैं
उड़ जाती हैं दो पल बैठ के
मगर दो पल तो बैठे मेरे पास
चुपके से पावों में
पायजेब पहना दूँगा।

रहस्य से भरे हैं लोग यहाँ
एक मैं ही दिल का खुला हूँ
तू एक पल को तो
दिल लगा के देख
मैं सारी उम्र उसी पल में
गुजार दूँगा।

शहर भर से मत पूछा कर
मेरे अतीत के किस्से
तू श्री गणेशाय: तो कर
मैं धीरे – धीरे तुझे
सब सुना दूँगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

गरीबी में भी गुरुर रखती हैं


वो अपनी बाहों में समंदर रखती हैं.
तभी तो इस गरीबी में भी गुरुर रखती हैं.

ना जिस्म पे सोने – चांदी के गहने
ना लाखों – हजारों का श्रृंगार ना कपड़े
मगर राजा, रंक सभी नज़ारे गराये हैं उसपे
जाने क्या?
मैंले – कुचले, फटे – चिथड़े
अपने दुप्पटे में वो रखती है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

धारा 497 (section 497 of IPC)


नशा पीने से हो या पिलाने से हो
नशा होना चाहिए।
दर्द सीने में हो या जीने में हो
दर्द होना चाहिए।
इश्क़ कुवारी से हो या विवाहित से हो
इश्क़ होना चाहिए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दो पल


वो जो मुझे तन्हा कर गयी
अब अपनी तन्हाई का जिक्र करती हैं.

दो पल में ख़त्म हो जाते हैं उनके सारे किस्से
और मेरे संग के दो पल का घंटों जिक्र करती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर