उनसे नजर का जो मिलना हुआ
पतली कमर का सिहरना हुआ.
कैसे सँभालते साँसों को हम?
नस-नस में उनका ऐसे उतरना हुआ.
परमीत सिंह धुरंधर
उनसे नजर का जो मिलना हुआ
पतली कमर का सिहरना हुआ.
कैसे सँभालते साँसों को हम?
नस-नस में उनका ऐसे उतरना हुआ.
परमीत सिंह धुरंधर
इश्क़ ने तन्हा कर दिया उम्र की बंदिशे लगाकर
उनकी पावों में पायजेब दे दिया मेरी नींदे उड़ाकर।
परमीत सिंह धुरंधर
सर पे बाल नहीं, मुँह में दांत नहीं
अंगुलियाँ भी कपकपा रही है मेरी
पर कैसे कह दूँ तुझसे मिलने के बाद?
तू अब भी मेरी खास नहीं।
माना की नजर कमजोर हो गयी है दूर की
माना की बालों पे सफेदी आ गयी है तुम्हारे, उम्र की
पर कैसे कह दूँ तुम्हे देखने के बाद?
सीने में उठता अब कोई तूफ़ान नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
सर्वदा – सर्वदा
बहती रहो धरा पे
नर्मदा – नर्मदा।
सम्पूर्ण करती हो भारत को
यूँ ही सम्पन करती रहो भारत को
गंगा – जमुना,
ताप्ती – गोदावरी – नर्मदा।
तुम्हारे ही तट पे रचे गए
वेद-उपनिषद-पुराण
तुम्हारे ही धाराओं से
उत्पन हुए ऋषि – मुनि – विद्वान।
सदियों से कर रही हो
भारत को परिभाषित
यूँ ही बनी रहो भारत की परिभाषा
सर्वदा – सर्वदा, नर्मदा – नर्मदा।
युगो – युगो से
पाल रही, पोस रही
सृष्टि को इस धरती पे
युगो – युगो तक यूँ ही माँ
करती रहो सबपे कृपा
सर्वदा – सर्वदा, नर्मदा – नर्मदा।
परमीत सिंह धुरंधर
जो भय से आक्रांत है
उसी का मन अशांत है.
जब वीर इतने साथ में
तो फिर बाली का क्यों ध्यान है?
परमीत सिंह धुरंधर
ए समंदर थोड़ा शांत रहा कर
तुझे मिला है स्वयं प्रभु का संग
तेरे सीने पे है उनके पदचाप
जिन्हे कहता है जमाना मर्यादा परुषोतम।
जिसके चरणों के घुल से अहिल्या तरी
जिसके लिए व्याकुल रहती थी बूढी शबरी बड़ी
तेरे दर पे ही, बिना एक क्षण गवाए
जिसने अर्पित किये थे माँ शक्ति को अपने नयन.
ए समंदर थोड़ा शांत रहा कर
तेरे दर पे स्वयं चल कर आया था वो
तुम्हारी पुत्री ने स्वयं किया था
समस्त जगत का त्याग कर जिसका पाणिग्रहण।
जिसके धीर के समक्ष हिमालय भी सूक्ष्म
जिसके एक दर्शन को
ऋषि – मुनि करते हैं तप अनंत
जिसने पिता के लिए किया वन का गमन.
ए समंदर थोड़ा शांत रहा कर
तुझसे राहे मांग रहा था वो हाथ जोड़कर
जिसने रचा है इस समस्त जगत को
जिसे समस्त जगत कहता है नारायण।
परमीत सिंह धुरंधर
दिल का हाल किसको सुनाऊँ?
जब दोस्त मेरा कनाडा बस गया.
शतरंज की विसात बीछी है
किसपे चाल चलूँ?
जब दोस्त मेरा कनाडा बस गया.
हिन्दू – मुस्लिम का झगड़ा करने वालों
पूरा भारत लेकर मैं क्या करूँ?
जब दोस्त मेरा कनाडा बस गया.
परमीत सिंह धुरंधर
रौशन करती हैं अँधेरे में जिंदगी को तेरी आँखे
कुदरत को जाने क्या मिला बना के तेरी आँखे?
कैसे गुजर जाए कोई पनघट से पी कर तेरी हाँथों से?
सैकड़ों सवाल पूछती हैं ह्रदय को रोक कर तेरी आँखें।
परमीत सिंह धुरंधर
इन लड़कियों को कोई बता दे
बड़ा दर्द होता है माँ को लाल के जुदाई से.
परमीत सिंह धुरंधर
जीवन भर की चाह कर
एक रात के लिए तो बाहों में उतर नहीं पाउंगी।
परमीत सिंह धुरंधर