मासिक -माहवारी


हम ही खगचर, हम ही नभचर
हमसे ही धरती और गगन
हम है भारत की संतान, मगर
भारत को ही नहीं है खबर हमारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

बाँध – बाँध के तन को अपने
काट – काट के पत्थर – पाषाण को
सौंदर्य दिया है जिस रूप को
उसके ही आँगन से निकाले गए,
जैसे मासिक -माहवारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

समझा जिनको बंधू – सखा
उन्होंने ना सिर्फ मुख मोड़ा
हथिया गए धीरे – धीरे, मेरी किस्मत,
तिजोरी, और रोटी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

सत्ता भी मौन खड़ी है, भीष्म – द्रोण, कर्ण सा
निर्वस्त्र करने को हमारी पत्नी, बहू और बेटी
रह गया है बाकी
अब केवल कुरुक्षेत्र की तैयारी।
पल -पल में प्रलय को रोका है, और
पल- पल ही है प्रलय सा हमपे भारी।

परमीत सिंह धुरंधर 

कुछ ऐसा कर दो मोदी जी


खेतों में पानी ला दो
और खलिहान में भर दो आनाज
कुछ ऐसा कर दो मोदी जी
की संसद में बैठें किसान।

मंदिर तो बनने से रहा
ना सुलझेगा काश्मीर
छोड़ो ये, कुछ ऐसा कर दो मोदी जी
की बच्चों के हाथों में हो किताब।

नारी निर्भीक हो जाए
ना कसे कोई उसपे लगाम
कुछ ऐसा कर दो मोदी जी
गावं – गावं हो जाए खुशहाल।

दवात-कलम से सजे हो गलियाँ
और बटती रहे घरों में मिठाइयाँ
कुछ ऐसा कर दो मोदी जी
फिर से जले पंजाब में सांझा – चूल्हा
और पके पकवान।

परमीत सिंह धुरंधर