Ego and Logic


If you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.
If you think
You are 100% correct.
I think too,
I am a genius.
If you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.
If you think
You are 100% logical.
I think too,
I am a champion philosopher.
So, if you cannot,
I cannot,
Because I am not that kind of man.

 

Parmit Singh Dhurandhar

मैं और मोदी


सावरकर के बाद मैं ही हूँ बुद्धिमान। और दुनिया गाँधी को समझती है. माना की मेरे निर्णय से मुझे बस घाटा ही हुआ है. पर सिर्फ मैं ही कूद सकता हूँ समुन्दर में, सावरकर के बाद. निर्णय लेने का साहस मुझमे ही है, नेता जी के बाद. और दुनिया है की नेहरू का नाम जपती है. घमंड में महाराणा के बाद मैं ही हूँ. और दुनिया है की मोदी – मोदी करती है.

आज बहुत दिनों बाद फिर खुद पे घमंड हो गया. सायद कल महाशिवरात्रि पे भगवान् शिव का पूजन करने से उनका आशीष मिला है.

परमीत सिंह धुरंधर

Keep the hope alive


Let the world glow,
It does not matter I die or survive.
Even if stars and moon are not mine,
Let them stay on my sky.
It’s better to give and keep the hope alive,
It does not matter I die or survive.

 

Parmit Singh Dhurandhar

अमीर खुद -ब-खुद बन जाएंगे


मिल कर कुछ दूर तो संग चले,
हौसले खुद-ब-खुद बढ़ जाएंगे।
एक पत्थर तो तोड़े संग बैठ के दोस्तों,
रास्ते खुद-ब-खुद सरल-सुगम हो जाएंगे।
मंजिलों की चाहत नहीं,
इस कदर तन्हा कटी है जिंदगी।
बस एक कारवाँ मिल जाए,
मंजीले हम खुद बना लेंगें।

सितारें जमीं पे लाने की कोसिस करने वालो,
कभी दिलों के दर्द को मिटा के तो देखो।
इस गुलशन की खुश्बूं आसमान तक जायेगी,
कभी फूलों को भौरों से मिला के तो देखो।
हाथ थाम कर कुछ देर तो संग बैठें,
हर जख्म खुद-ब-खुद मिट जाएंगे।
कुछ और नहीं तो,
किस्से -कहानियां ही बाँट ले संग में,
अमीर तो हम खुद -ब-खुद बन जाएंगे।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मुस्कुराना छूट गया


जब से जावानी आई,
मुस्कुराना छूट गया.
ये दर्पण तू सखी हो गयी,
सहेलियों संग खेलना छूट गया.

ख्वाब ऐसे है जैसे,
धीमी -धीमी आंच पे तलती सब्जी,
और धीमी-धीमी आंच पे पकना,
अब मेरा ख्वाब बन गया.

सबकी नजर यूँ देखती हैं,
की अब,
धीमे पावँ चलना,
सीखना पड़ रहा है.
जो दिखाना चाहती हूँ,
वो सब छुपाना पड़ रहा है.
एक चुनर के सरकने पे,
ववाल इतना,
की गलियों-मोहल्लों में,
अब निकलना छूट गया.

मेरे अंगों पे जब फिसल जाती हैं,
जुल्फों से गिरती बुँदे।
तो आसमान के तले,
वो बरसात में भींगना याद आ गया.
जब से जावानी आई,
मुस्कुराना छूट गया.
ये दर्पण तू सखी हो गयी,
सहेलियों संग खेलना छूट गया.

The poem is inspired by a girl sitting alone in the room, looking down and thinking something which I did not get.

परमीत सिंह धुरंधर

इंसान


इंसान को इंसान का, बस चाहिए यहाँ साथ,
फिर क्या वक्त अच्छा, और क्या है वक्त ख़राब?
पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, सब है इसके बाद.
धन-दौलत, कर्म-ज्ञान, बिन इसके सब है बेकार।
इंसान को इंसान का, बस चाहिए यहाँ साथ.
फिर क्या वक्त अच्छा, और क्या है वक्त ख़राब?

 

परमीत सिंह धुरंधर

नहीं रखूंगी अम्मा चुनर अपने बक्षों पे


कलम आपको वो समय देखने को शक्ति देती है, जो आप लाना चाहते हो. लेकिन आप विवस हो और नहीं ला सकते। कलम, आपको अपनी असफलताओं को छुपाने का माध्यम है. दुनिया के सबसे असफल आदमी की कलम ज्यादा मुखर होती है. ये पंक्तियाँ, उन लड़कियों और महिलाओं के लिए समर्पित है जिन्हें ३१ दिसम्बर २०१६ को बंगलोरे में शारीरिक उत्पीरण का सामना करना पड़ा. कुछ लोग बस जीवन में सिर्फ लड़कियों को पाना चाहते हैं. और मैं वो समय लाना चाहता हूँ जब कोई भी लड़की कैसे भी अपनी मर्जी से जीये और जी सके.

काले – काले मन के,
पहले भ्रम को,
कैसे तोड़ दूँ मैं?
मैं नहीं रखूंगी अम्मा,
चुनर अपने बक्षों पे.
गली-गली में गुजरती हूँ जब,
खुल जाते हैं, सब खिड़की-दरवाजे।
मेरी चाल पे बजाते हैं,
सीटी, बच्चों से बूढ़े।
अपनी नयी – नयी जावानी को,
नहीं ढकूँगी अम्मा, रखके,
चुनर अपने बक्षों पे.

परमीत सिंह धुरंधर

रातों में नेहरू बनना चाहते हैं


ज़माने को गुनाह करने दो,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगे।
सिरफिरों में मेरा नाम
चलने दो।

भगत सिंह की इस धरती पर
सब लंबा जीना चाहते हैं।
रातों में नेहरू
और दिन में गाँधी
बनना चाहते हैं।
वो चालक हैं, चतुर हैं,
सत्ता हथिया लेंगे।

मुझे संघर्ष की राहों का
राम मनोहर लोहिया बनने दो।
भीड़ के इस अंधे मेले में
थोड़ा अलग तो मुझे रहने दो।
जो सच कहें,
उन्हें पागल ही रहने दो।

लड़कियों का क्या है?
वो इन्हीं से प्रेम करेंगी,
कुँवारी इन्हीं के बच्चों की माँ बनेंगी,
और फिर इन्हीं के आँगन में रोएँगी।
जो सच्चे होंगे,
वो ठुकरा दिए जाएँगे,
जो शातिर होंगे,
वो गले लगाए जाएँगे।

वो कमजोर नहीं, पारंगत हैं
इस शोषण के खेल में।
उन्हें ये खेल खेलने दो।
सत्ता के खिलाफ बिगुल
बजाने वालों में मेरा नाम रहने दो।

ज़माने को गुनाह करने दो,
हम इश्क़ करेंगे।
वो शांत हैं, शातिर हैं,
बच के निकल लेंगे।
सिरफिरों में मेरा नाम
चलने दो।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

यह कविता समाज की नैतिक विडंबनाओं, राजनीतिक पाखंड, प्रेम में छल, और सच्चाई के संघर्ष को व्यक्त करती है। कवि स्वयं को उस भीड़ से अलगमानता है जो सत्ता, स्वार्थ और दिखावे के पीछे भागती है।

कविता में Bhagat Singh, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi और Ram Manohar Lohia जैसे व्यक्तित्वों के माध्यम से आदर्शवादऔर अवसरवाद के बीच का विरोध दिखाया गया है। कवि उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है जहाँ चालाक और शातिर लोग सफल हो जाते हैं, जबकि सच्चे और संवेदनशील लोग ठुकरा दिए जाते हैं।

“हम इश्क़ करेंगे” पंक्ति केवल प्रेम का प्रतीक नहीं, बल्कि विद्रोह, सत्य और मानवीय संवेदना को बचाए रखने का संकल्प है। पूरी कविता संघर्ष, अस्वीकार, और व्यवस्था-विरोधी चेतना का स्वर प्रस्तुत करती है।

This poem expresses rebellion against social hypocrisy, political opportunism, emotional manipulation, and the rejection of sincerity in modern society. The poet sees himself as different from the crowd that blindly chases power, image, and self-interest.

Through references to Bhagat Singh, Jawaharlal Nehru, Mahatma Gandhi, and Ram Manohar Lohia, the poem contrasts revolutionary ideals with the hypocrisy of contemporary society. It criticizes a world where cunning and manipulative people gain power and admiration, while honest and emotionally genuine individuals are ignored or rejected.

The recurring line, “We will continue to love,” is not merely about romance; it symbolizes resistance, humanity, and the refusal to surrender one’s truth despite corruption and betrayal. Overall, the poem represents a voice of struggle, alienation, and defiance against both social and political systems.

गुनाहों की चादर


दुनिया की भीड़ में,
मैं खो गया.
ऐसा आप सोचते हो,
ये हकीकत नहीं हैं दोस्तों।
हकीकत तो ये है की,
गुनाहों की चादर,
इतनी लंबी है उनकी,
की मैं आसानी से छुप गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

औरत – मर्द


वो जो कल तक,
मेरी किस्मत बदलना चाहती थी,
अब अपना घर बदल रही हैं.
मर्द बस बदनाम हैं इस बाजार में,
गली – गली में औरत अपना बिस्तर,
बदल रही है.

 

परमीत सिंह धुरंधर