घूँघट और बेड़ियाँ


ये तय है की,
नदियों पे बाँध बाँधा जाय.
मगर ये ठीक नहीं की,
उनकी चौहदी तय की जाय.

ये माना की घूँघट भाता है,
हुस्न के मुखड़े पे.
पर ये ठीक नहीं की,
इसे उसकी बेड़ियाँ बनायीं जाय.

 

परमीत सिंह धुरंधर

2 thoughts on “घूँघट और बेड़ियाँ

Leave a reply to Madhusudan Cancel reply