अंततः उन्हें कोई भाया था


खुले दिल से
अरमानों को सजाया था
कुछ टूट गए, कुछ सूख गए
मैंने दिल ही कुछ ऐसे लगाया था.

हम तन्हा रह गए
कोई शिकवा नहीं
अंततः उन्हें कोई भाया था
जिसके संग
उन्होंने परिणय-पत्र छपवाया था.

परमीत सिंह धुरंधर

Leave a comment